Atharvaveda / 18 / 4 / 55
यथा॑ य॒माय॑ह॒र्म्यमव॑प॒न्पञ्च॑ मान॒वाः। ए॒वा व॑पामि ह॒र्म्यं यथा॑ मे॒ भूर॒योऽस॑त॥55॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 18 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 55
In English:
Seer : atharvaa | Devta : yama, mantrokt | Metre : bhuriktriShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yathaa yamaayaharmyamavapanpa~ncha maanavaaH. evaa vapaami harmya.m yathaa me bhuurayo.asata.55.
Component Words : yathaa . yamaaya . harmyam . avapan . pa~ncha . maanavaaH . eva . vapaami . harmyam.N . yathaa . me . bhuurayaH . asata .4.55.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : यम, मन्त्रोक्त | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : मनुष्य को वृद्धि करने का उपदेश।
पदपाठ : यथा॑ । य॒माय॑ । ह॒र्म्यम् । अव॑पन् । पञ्च॑ । मा॒न॒वा: । ए॒व । व॒पा॒मि॒ । ह॒र्म्यम् । यथा॑ । मे॒ । भूर॑य: । अस॑त ॥४.५५॥
पदार्थ : (यथा) जैसे (यमाय)न्यायकारी राजा के लिये (पञ्च) पाँच [पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश, इन पाँचतत्त्वों] से सम्बन्धवाले (मानवाः) मनुष्यों ने (हर्म्यम्) स्वीकार करने योग्यराजमहल (अवपन्) फैलाकर बनाया है। (एव) वैसे ही मैं (हर्म्यम्) सुन्दर राजमहल (वपामि) फैलाकर बनाता हूँ, (यथा) जिस से (मे) मेरे लिये (भूरयः) बहुत से (असत)तुम होओ ॥५५॥"
भावार्थ : टिप्पणी :५५−(यथा) सादृश्ये (यमाय) न्यायकारिणे शासकाय (हर्म्यम्) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। हृञ्स्वीकारे-यक्, मुडागमः। हर्म्यं गृहनाम-निघ० ३।४। स्वीकरणीयं महिलायोग्यं गृहम्।धनिनां गृहम् (अवपन्) डुवप बीजसन्ताने। बीजवद् विस्तार्य निर्मितवन्तः (पञ्चमानवाः) अ० १२।१।१५। पृथिव्यादिपञ्चभूतसंबन्धिनो मनुष्याः (एव) एवम् (वपामि) संपादयामि। निर्मिमे (हर्म्यम्) राजगृहम् (यथा) येन प्रकारेण (मे)मह्यम् (भूरयः) बहवः (असत) अस्तेर्लेटि, अडागमः। यूयं स्यात् ॥