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Atharvaveda / 18 / 4 / 80

स्व॒धापि॒तृभ्यो॑ दिवि॒षद्भ्यः॑ ॥80॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 18 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 80

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : यम, मन्त्रोक्त | छन्द : आसुरी जगती | स्वर :

विषय : पितरों के सन्मान का उपदेश।

पदपाठ : स्व॒धा । पि॒तृऽभ्य॑:। दि॒वि॒सत्ऽभ्य॑: ॥४.८०॥

पदार्थ : (दिविषद्भ्यः) प्रकाशविद्या में गतिवाले (पितृभ्यः) पितरों [पालक ज्ञानियों] को (स्वधा) अन्न हो॥८०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :८०−(दिविषद्भ्यः) सप्तम्या अलुक्। प्रकाशविद्यायां गतिशीलेभ्यः। अन्यत्पूर्ववत् ॥