Atharvaveda / 18 / 4 / 88
आ त्वा॑ग्नइधीमहि द्यु॒मन्तं॑ देवा॒जर॑म्। यद्घ॒ सा ते॒ पनी॑यसी स॒मिद्दी॒दय॑ति॒ द्यवि॑।इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र ॥88॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 18 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 88
In English:
Seer : atharvaa | Devta : agni | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : aa tvaagnaidhiimahi dyumanta.m devaajaram. yadgha saa te paniiyasii samiddiidayati dyavi.iSha.m stotRRibhya aa bhara .88.
Component Words : aa . tvaa . agne . idhiimahi . dyu.amantam . deva . ajaram . yat . gha . saa . te . paniiyasii . sam.ait . diidayati . dyavi . iSham . stotRRi.abhyaH . aa . bhara . 4.88.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : अग्नि | छन्द : त्र्यवसाना पथ्यापङ्क्ति | स्वर :
विषय : परमात्मा की उपासना का उपदेश।
पदपाठ : आ । त्वा॒ । अ॒ग्ने॒ । इ॒धी॒म॒हि॒ । द्यु॒ऽमन्त॑म् । दे॒व॒ । अ॒जर॑म् । यत् । घ॒ । सा । ते॒ । पनी॑यसी । स॒म्ऽइत् । दी॒दय॑ति । द्यवि॑ । इष॑म् । स्तो॒तृऽभ्य॑: । आ । भ॒र॒ ॥ ४.८८॥
पदार्थ : (देव) हे आनन्दप्रद ! (अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (द्युमन्तम्) प्रकाशयुक्त (अजरम्) अजर [जरारहित, सदा बलवान्] (त्वा) तुझको (आ) सब ओर से [हृदय में] (इधीमहि) हमप्रकाशित करें। (यत्) जो (सा) वह (घ) निश्चय करके (ते) तेरी (पनीयसी) अतिप्रशंसनीय (समित्) चमक (द्यवि) चमकते हुए [सूर्य आदि में] (दीदयति) चमकती है। [उससे] (इषम्) इष्ट पदार्थ को (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालों के लिये (आ) सब ओरसे (भर) भर दे ॥८८॥"
भावार्थ : टिप्पणी :८८−(आ) समन्तात् (त्वा)त्वाम् (अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् (इधीमहि) इन्धेर्लिङि रूपम्। दीपयेम (द्युमन्तम्) दीप्तिमन्तम् (देव) हे सुखप्रद (अजरम्) जरारहितम्। बलवन्तम् (यत्)विभक्तेर्लुक्। या (घ) निश्चयेन (सा) प्रसिद्धा (ते) तव (पनीयसी) पनतिःस्तुतिकर्मा। स्तुत्यतरा (समित्) सम्यग् दीप्तिः (दीदयति) दीप्यते (द्यवि)द्योतमाने सूर्यादौ (इषम्) इष्टं पदार्थम् (स्तोतृभ्यः) स्तावकेभ्यः (आ)समन्तात् (भर) धर ॥