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Atharvaveda / 19 / 6 / 6

ब्रा॑ह्म॒णो᳡ऽस्य॒ मुख॑मासीद्बा॒हू रा॑ज॒न्यो᳡ऽभवत्। मध्यं॒ तद॑स्य॒ यद्वैश्यः॑ प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत ॥ 6॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 19 | Sukta : 6 | Paryay : | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : नारायणः | देवता : पुरुषः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : सृष्टिविद्या का उपदेश।

पदपाठ : ब्रा॒ह्म॒णः। अ॒स्य॒। मुख॑म्। आ॒सी॒त्। बा॒हू इति॑। रा॒ज॒न्यः᳡। अ॒भ॒व॒त्। मध्य॑म्। तत्। अ॒स्य॒। यत्। वैश्यः॑। प॒त्ऽभ्याम्। शू॒द्रः। अ॒जा॒य॒त॒ ॥६.६॥

पदार्थ : (ब्राह्मणः) ब्राह्मण [वेद और ईश्वर का जाननेवाला मनुष्य] (अस्य) इस [पुरुष] का (मुखम्) मुख (आसीत्) था, (राजन्यः) क्षत्रिय [शासक मनुष्य] (बाहू) [उसकी] दोनों भुजाएँ (अभवत्) हुआ। (अस्य) इसका (यत्) जो (मध्यम्) मध्य [घुटनों का भाग] है, (तत्) वह (वैश्यः) वैश्य [मनुष्यों का हितकारी] और (पद्भ्याम्) [उसके] दोनों पैरों से (शूद्राः) शूद्र [शोचनीय मूर्ख] (अजायत) उत्पन्न हुआ ॥६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।९०।१२, यजुर्वेद−३१।११ ॥ ६−(ब्राह्मणः) वेदेश्वरवित् (अस्य) पुरुषस्य (मुखम्) मुखमिवोत्तमः (आसीत्) अभवत् (बाहू) भुजाविव बलवीर्ययुक्तः (राजन्यः) क्षत्रियः शासकः (अभवत्) (मध्यम्) मध्याङ्गम्। ऊर्वोरुपलक्षणमेतत् (तत्) मध्यम् (अस्य) पुरुषस्य (यत्) मध्यम् (वैश्यः) विशो मनुष्यनाम-निघ० २।३। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। विश−यञ्। विड्भ्यो मनुष्येभ्यो हितः। वेदाध्ययनकृषिवाणिज्यादिवृत्तिकः (पद्भ्याम्) पद्भ्यां गमनागमनव्यवहाराभ्यां सेवाशीलः (शूद्रः) शुचेर्दश्च। उ–० २।१९। शुच शोके−रक्। दश्चान्तादेशो घातोर्दीर्घश्च। शोचनीयो विद्याहीनो मूर्खो जनः (अजायत) उत्पन्नोऽभवत् ॥