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Atharvaveda / 19 / 9 / 9

नक्ष॑त्रमु॒ल्काभिह॑तं॒ शम॑स्तु नः॒ शं नो॑ऽभिचा॒राः शमु॑ सन्तु कृ॒त्याः। शं नो॒ निखा॑ता व॒ल्गाः शमु॒ल्का दे॑शोपस॒र्गाः शमु॑ नो भवन्तु ॥ 9॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 19 | Sukta : 9 | Paryay : | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : शान्तिः, मन्त्रोक्ताः | छन्द : पञ्चपदा ककुम्मती त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : मनुष्यों को कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : नक्ष॑त्रम्। उ॒ल्का। अ॒भिऽह॑तम्। शम्। अ॒स्तु॒। नः॒। शम्। नः॒। अभि॒ऽचा॒राः। शम्। ऊँ॒ इति॑। स॒न्तु॒। कृ॒त्याः। शम्। नः॒। निऽखा॑ताः। व॒ल्गाः। शम्। उ॒ल्काः। दे॒शो॒प॒ऽस॒र्गाः। शम्। ऊँ॒ इति॑। नः॒। भ॒व॒न्तु॒ ॥९.९॥

पदार्थ : (उल्का) उल्काओं [टूटते तारों] से (अभिहतम्) नष्ट किया हुआ (नक्षत्रम्) नक्षत्र (नः) हमें (शम्) शान्तिदायक (अस्तु) होवे, (नः) हमारे लिये (अभिचाराः) विरुद्ध आचरण (शम्) शान्तिदायक (उ) और (कृत्याः) हिंसा क्रियाएँ (शम्) शान्तिदायक (सन्तु) होवें। (निखाताः) खोदे हुए (वल्गाः) गढ़े [सुरङ्ग आदि] (नः) हमें (शम्) शान्तिदायक, (उल्काः) उल्काएँ [टूटते तारे] (शम्) शान्तिदायक, (उ) और (देशोपसर्गाः) देश के उपद्रव (नः) हमें (शम्) शान्तिदायक (भवन्तु) होवें ॥९॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :९−(नक्षत्रम्) गमनशीलो लोकः (उल्का) म० ८। उल्काभिः। रेखाकारे गगनात् पतत्तेजोभिः (अभिहतम्) विनष्टम् (शम्) शान्तिप्रदम् (अस्तु) (नः) अस्मभ्यम् (अभिचाराः) व्यभिचाराः। विरुद्धाचरणानि (शम्) (उ) चार्थे (कृत्याः) अ० १४।२।४९। कृञ् हिंसायाम्−क्यप् तुक् च। हिंसाक्रियाः (शम्) (नः) (निखाताः) विदारिताः (वल्गाः) मुदिग्रोर्गग्गौ। उ० १।१२८। वल संवरणे−ग प्रत्ययः। गर्ताः। भूमिच्छिद्राणि (शम्) (उल्काः) म० ८। गगनात्पतत्तेजःपुञ्जाः (देशोपसर्गाः) देशोपद्रवाः (शम्) (उ) (नः) (भवन्तु) ॥