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Atharvaveda / 19 / 44 / 3

आञ्ज॑नं पृथि॒व्यां जा॒तं भ॒द्रं पु॑रुष॒जीव॑नम्। कृ॒णोत्वप्र॑मायुकं॒ रथ॑जूति॒मना॑गसम् ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 19 | Sukta : 44 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : भृगुः | देवता : आञ्जनम् | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : ब्रह्म की उपासना का उपदेश।

पदपाठ : आ॒ऽअञ्ज॑नम्। पृ॒थि॒व्याम्। जा॒तम्। भ॒द्रम्। पु॒रु॒ष॒ऽजीव॑नम्। कृ॒णोतु॑। अप्र॑ऽमायुकम्। रथ॑ऽजूतिम्। अना॑गसम् ॥४४.३॥

पदार्थ : (पृथिव्याम्) पृथिवी पर (जातम्) प्रसिद्ध, (भद्रम्) कल्याणकारक, (पुरुषजीवनम्) पुरुषों का जीवन (आञ्जनम्) आञ्जन [संसार का प्रकट करनेवाला ब्रह्म, वा लेपविशेष] [मुझको] (अप्रमायुकम्) मृत्युरहित, (रथजूतिम्) रथ [शरीर] का वेग रखनेवाला, और (अनागसम्) निर्दोष (कृणोतु) करे ॥३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :३−(आञ्जनम्) म०१। संसारस्य व्यक्तिकारकं ब्रह्म। प्रलेपविशेषः (पृथिव्याम्) भूमौ (जातम्) प्रसिद्धम् (भद्रम्) कल्याणकरम् (पुरुषजीवनम्) पुरुषाणां जीवयितृ (कृणोतु) करोतु-मामिति शेषः (अप्रमायुकम्) पचिनशोर्णुकन्कनुमौ च। उ०२।३०। मीञ् हिंसायां मरणे च-णुकन्। मृत्युरहितम् (रथजूतिम्) रथस्य शरीरस्य जूतिर्वेगो यस्मात्तम् (अनागसम्) निर्दोषम् ॥