Atharvaveda / 20 / 4 / 3
स्वा॒दुष्टे॑ अस्तु सं॒सुदे॒ मधु॑मान्त॒न्वे॒ तव॑। सोमः॒ शम॑स्तु ते हृ॒दे ॥3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : irimbiThiH | Devta : indraH | Metre : viraaDanuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : svaaduShTe astu sa.msude madhumaantanve tava. somaH shamastu te hRRide .3.
Component Words : svaaduH . te . astu . sam.asude . madhu.amaan . tanve . tava . somaH . sham . astu . te . hRRide .4.3.
In Hindi:
ऋषि : इरिम्बिठिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :
विषय : महौषधियों के रसपान का उपदेश।
पदपाठ : स्वा॒दु: । ते॒ । अ॒स्तु॒ । स॒म्ऽसुदे॑ । मधु॑ऽमान् । त॒न्वे॑ । तव॑ । सोम॑: । शम् । अ॒स्तु॒ । ते॒ । हृदे ॥४.३॥
पदार्थ : [हे राजन् !] (सोमः) सोम [उत्तम ओषधियों का रस] (ते) तेरे (संसुदे) स्वीकार करने के लिये (स्वादुः) स्वादु [रोचक] और (तव) तेरे (तन्वे) शरीर के लिये (मधुमान्) मधुर रसवाला (अस्तु) होवे और (ते) तेरे (हृदे) हृदय के लिये (शम्) शान्तिकारक (अस्तु) होवे ॥३॥"
भावार्थ : टिप्पणी :३−(स्वादुः) रोचकः (ते) तव (अस्तु) (संसुदे) षूद आश्रुतिहत्योः-क्विप्, छान्दसो ह्रस्वः, आश्रुतिरङ्गीकारः। सम्यक् स्वीकरणाय (मधुमान्) माधुर्योपेतः (तन्वे) शरीराय (तव) (सोमः) सदौषधिरसः (तन्वे) शरीराय (शम्) सुखकरः (अस्तु) (ते) तव (हृदे) हृदयाय ॥