Atharvaveda / 20 / 30 / 2
हरिं॒ हि योनि॑म॒भि ये स॒मस्व॑रन्हि॒न्वन्तो॒ हरी॑ दि॒व्यं यथा॒ सदः॑। आ यं पृ॒णन्ति॒ हरि॑भि॒र्न धे॒नव॒ इन्द्रा॑य शू॒षं हरि॑वन्तमर्चत ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 30 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : baruH sarvaharirvaa | Devta : hariH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : hari.m hi yonimabhi ye samasvaranhinvanto harii divya.m yathaa sadaH. aa ya.m pRRiNanti haribhirna dhenava indraaya shuuSha.m harivantamarchata . 2.
Component Words : harim . hi . yonim . abhi . ye . sam.aasvaran . hinvantaH . harii iti . divyam . yathaa . sadaH . aa . yam . pRRiNanti . hara.Ni.abhiH . na . dhenavaH . indraaya . shuuSham . hari.avantam .archata .30.2.
In Hindi:
ऋषि : बरुः सर्वहरिर्वा | देवता : हरिः | छन्द : जगती | स्वर :
विषय : बल और पराक्रम का उपदेश।
पदपाठ : हरि॑म् । हि । योनि॑म् । अ॒भि । ये । स॒म्ऽअस्व॑रन् । हि॒न्वन्त॑: । ह॒री इति॑ । दि॒व्यम् । यथा॑ । सद॑: ॥ आ । यम् । पृ॒णन्ति॑ । हरि॑ऽभि: । न । धे॒नव॑: । इन्द्रा॑य । शू॒षम् । हरि॑ऽवन्तम् ।अ॒र्च॒त॒ ॥३०.२॥
पदार्थ : (हरी) दुःख हरनेवाले दोनों बल और पराक्रम को (हिन्वन्तः) बढ़ाते हुए (ये) जो लोग (दिव्यम्) दिव्य गुणवाले (सदः यथा) समाज के समान (हरिम्) दुःख मिटानेवाले [सेनापति] को (हि) निश्चय करके (योनिम् अभि) न्याय घर में (समस्वरन्) अच्छे प्रकार सराहते हैं, और (यम्) जिस [सेनापति] को (हरिभिः) शूर पुरुषों सहित (धेनवः न) गौओं के समान [जो] (आ) सब ओर से (पृणन्ति) तृप्त करते हैं, (इन्द्राय) ऐश्वर्य के लिये (शूषम्) सुख से (हरिवन्तम्) उस शूर पुरुषोंवाले [सेनापति को] (अर्चत) तुम पूजो ॥२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२−(हरिम्) दुःखहर्तारं सेनापतिम् (हि) निश्चयेन (योनिम्) न्यायगृहम् (अभि) प्रति (ये) पुरुषाः (समस्वरन्) स्वृ शब्दोपतापयोः-लडर्थे लङ्। सम्यक् स्तुवन्ति (हिन्वन्तः) हि गतिवृद्ध्योः-शतृ। वर्धयन्तः (हरी) दुःखहर्तारौ बलपराक्रमौ (दिव्यम्) उत्तमगुणविशिष्टम् (यथा) (सदः) समाजः (आ) समन्तात् (यम्) सेनापतिम् (पृणन्ति) पृण तर्पणे। तर्पयन्ति (हरिभिः) शूरमनुष्यैः सह (न) यथा (धेनवः) गावः (इन्द्राय) ऐश्वर्याय (शूषम्) शूषं सुखनाम-निघ० ३।६। सुखेन (हरिवन्तम्) शूरपुरुषैर्युक्तम् (अर्चत) पूजयत ॥