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Atharvaveda / 20 / 53 / 2

दा॒ना मृ॒गो न वा॑र॒णः पु॑रु॒त्रा च॒रथं॑ दधे। नकि॑ष्ट्वा॒ नि य॑म॒दा सु॒ते ग॑मो म॒हाँश्च॑र॒स्योज॑सा ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 53 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर :

विषय : सेनापति के लक्षणों का उपदेश।

पदपाठ : दा॒ना । मृ॒ग:। वा॒र॒ण: । पु॒रु॒ऽत्रा । च॒रथ॑म् । द॒धे॒ ॥ नकि॑: । त्वा॒ । नि । य॒म॒त् । आ । सु॒ते । ग॒म॒: । म॒हान् । च॒र॒सि॒ । ओज॑सा ॥५३.२॥

पदार्थ : (न) जैसे (मृगः) जंगली (वारणः) हाथी (दाना) मद के कारण (पुरुत्रा) बहुत प्रकार से (चरथम्) झपट (दधे) लगाता है। [वैसे ही] (नकिः) कोई नहीं (त्वा) तुझे (नि यमत्) रोक सकता, (सुते) तत्त्व रस को (आ गमः) तू प्राप्त हो, (महान्) महान् होकर तू (ओजसा) बल के साथ (चरसि) विचरता है ॥२•॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(दाना) दानेन। मदजलेन (मृगः) वनचरः (न) यथा (वारणः) गजः (पुरुत्रा) बहुप्रकारेण (चरथम्) शीङ्शपिरुगमि। उ० ३।११३। चरतेः अथप्रत्ययः। संचरणम् (दधे) धरति (नकिः) न कोऽपि (त्वा) त्वाम् (नि यमत्) नियच्छति (आ) (सुते) तत्त्वरसम् (गमः) प्राप्नुहि (महान्) (चरसि) (ओजसा) ॥