Atharvaveda / 20 / 61 / 5
यस्य॑ द्वि॒बर्ह॑सो बृ॒हत्सहो॑ दा॒धार॒ रोद॑सी। गि॒रीँरज्राँ॑ अ॒पः स्व᳡र्वृषत्व॒ना ॥ 5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 61 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : goShuuktiH, ashvasuuktiH | Devta : indraH | Metre : aasurii gaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yasya dvibarhaso bRRihatsaho daadhaara rodasii. girii.Nrajraa.N apaH sva᳡rvRRiShatvanaa . 5.
Component Words : yasya . dvi.abarhasaH . bRRihat . sahaH . daadhaara . rodasii iti . giriin . ajraan . apaH . svaH . vRRiSha.atvanaa .61.5.
In Hindi:
ऋषि : गोषूक्तिः, अश्वसूक्तिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : उष्णिक् | स्वर :
विषय : परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : यस्य॑ । द्वि॒ऽबर्ह॑स: । बृ॒हत् । सह॑: । दा॒धार॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । गि॒रीन् । अज्रा॑न् । अ॒प: । स्व॑: । वृ॒ष॒ऽत्व॒ना ॥६१.५॥
पदार्थ : (द्विबर्हसः) दोनों विद्या और पुरुषार्थ में बढ़े हुए (यस्य) जिस [परमात्मा] के (बृहत्) बड़े (सहः) सामर्थ्य ने (रोदसी) सूर्य और भूमि, (अज्रान्) शीघ्रगामी (गिरीन्) मेघों, (अपः) जलों [समुद्र आदि] और (स्वः) प्रकाश को (वृषत्वना) बल के साथ (दाधार) धारण किया है ॥॥"
भावार्थ : टिप्पणी :−(यस्य) परमात्मनः (द्विबर्हसः) गतिकारकोपपदयोः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वं च। उ० ४।२२७। द्वि+बर्ह प्राधान्ये-असि। द्वयोर्विद्यापुरुषार्थयोः परिवृद्धस्य (बृहत्) महत् (सहः) सामर्थ्यम् (दाधार) धारितवान् (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (गिरीन्) मेघान् (अज्रान्) स्फायितञ्चिवञ्चिशकि०। उ० २।१३। अज गतिक्षेपणयोः-रक्, वीभावाभावः। क्षिप्रान्-निघ० २।१। शीघ्रगमनान् (अपः) जलानि समुद्रादीनि (स्वः) प्रकाशम् (वृषत्वना) वृषत्वेन। वीर्येण ॥॥