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Atharvaveda / 20 / 62 / 1

व॒यमु॒ त्वाम॑पूर्व्य स्थू॒रं न कच्चि॒द्भर॑न्तोऽव॒स्यवः॑। वाजे॑ चि॒त्रं ह॑वामहे ॥ 1॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 62 | Paryay : | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : सौभरिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः | स्वर :

विषय : १-४ राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : व॒यम् । ऊं॒ इति॑ । त्वाम् । अ॒पू॒र्व्य॒ । स्थू॒रम् । न । कत् । चि॒त् । भर॑न्त: । अ॒व॒स्यव॑: ॥ वाजे॑ । चि॒त्रम् । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥६२.१॥

पदार्थ : (अपूर्व्य) हे अनुपम ! [राजन्] (कत् चित्) कुछ भी (स्थूरम्) स्थिर (न) नहीं (भरन्तः) रखते हुए, (अवस्यवः) रक्षा चाहनेवाले (वयम्) हम (वाजे) सङ्ग्राम के बीच (चित्रम्) विचित्र स्वभाववाले (त्वाम्) तुझको (उ) ही (हवामहे) बुलाते हैं ॥१॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :मन्त्र १-४ आ चुके हैं-अथर्व० २०।१४।१-४ ॥ १-४−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० २०।१४।१-४ ॥