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Atharvaveda / 20 / 63 / 5

क॒दा मर्त॑मरा॒धसं॑ प॒दा क्षुम्प॑मिव स्फुरत्। क॒दा नः॑ शुश्रव॒द्गिर॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 63 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गोतमः | देवता : इन्द्रः | छन्द : उष्णिक् | स्वर :

विषय : १-६ राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : क॒दा । मर्त॑म् । अ॒रा॒धस॑म् । प॒दा । क्षुम्प॑म्ऽइव । स्फु॒र॒त् ॥ क॒दा । न॒: । शु॒श्र॒व॒त् । गिर॑: । इन्द्र॑: । अ॒ङ्ग ॥६३.५॥

पदार्थ : (अङ्ग) हे मित्र ! (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले सभापति आप] (कदा) कब (अराधसम्) आराधना न करनेवाले (मर्तम्) मनुष्य को (पदा) पाँव से (क्षुम्पम् इव) खुम्भी [गीली लकड़ी से उगे हुए छत्राकार छोटे पौधे] के समान (स्फुरत्) नष्ट करेंगे और (कदा) कब (नः) हमारी (गिरः) वाणियों को (शुश्रवत्) सुनेंगे ॥॥ "

भावार्थ :

टिप्पणी :यह मन्त्र निरुक्त में व्याख्यात है-।१६-१७ ॥ −(कदा) कस्मिन् काले (मर्तम्) मनुष्यम् (अराधसम्) अनाराधयन्तम्-निरु० ।१७ (पदा) पादेन (क्षुम्पम्) गलितकाष्ठोत्पन्नक्षुद्रवृक्षम्। अहिछत्रकम्-निरु० ।१६ (इव) यथा (स्फुरत्) स्फुरतिर्वधकर्मा-निघ० २।१९। अवस्फुरिष्यति। वधिष्यति (कदा) (नः) अस्माकम् (शुश्रवत्) श्रोष्यति-निरु० ।१७। (गिरः) वाणीः (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् सभाध्यक्षो भवान् (अङ्ग) हे मित्र ॥