Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 20 / 84 / 2

इन्द्रा या॑हि धि॒येषि॒तो विप्र॑जुतः सु॒ताव॑तः। उप॒ ब्रह्मा॑णि वा॒घतः॑ ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 84 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दाः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : सभापति के कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : इन्द्र॑ । आ । या॒हि॒ । धि॒या । इ॒षि॒त: । विप्र॑ऽजूत: । सु॒तऽव॑त: ॥ उप॑ । ब्रह्मा॑णि । वा॒घत॑: ॥८४.२॥

पदार्थ : (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले सभापति] (धिया) कर्म से (इषितः) बढ़ाया गया, और (विप्रजूतः) बुद्धिमानों से वेगवान् किया गया तू (सुतावतः) सिद्ध किये हुए तत्त्वरस वाले (वाघतः) बुद्धिमान् पुरुषों को और (ब्रह्माणि) धनों को (उप=उपेत्य) प्राप्त होकर (आ याहि) आ ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(इन्द्र) (आ याहि) (धिया) कर्मणा-निघ० २।१। (इषितः) प्रेरितः (विप्रजूतः) जू इति सौत्रो धातुः गतौ-क्त। मेधाविभिः प्रेरिते वेगयुक्तः कृतः (सुतावतः) निष्पादिततत्त्वरसयुक्तान् (उप) उपेत्य (ब्रह्माणि) धनानि (वाघतः) आ० २०।१९।२। मेधाविनः पुरुषान्-निघ० ३।१ ॥