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Atharvaveda / 20 / 96 / 19

हृद॑यात्ते॒ परि॑ क्लो॒म्नो हली॑क्ष्णात्पा॒र्श्वाभ्या॑म्। यक्ष्मं॒ मत॑स्नाभ्यां प्ली॒ह्नो य॒क्नस्ते॒ वि वृ॑हामसि ॥ 19॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 96 | Paryay : | Mantra No : 19

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : यक्ष्मनाशनम् | छन्द : ककुम्मत्यनुष्टुप् | स्वर :

विषय : शारीरिक विषय में शरीररक्षा का उपदेश।

पदपाठ : हृद॑यात् । ते॒ । परि॑ । क्लो॒म्न: । हली॑क्ष्णात् । पा॒र्श्वाभ्या॑म् ॥ यक्ष्म॑म् । मत॑स्नाभ्याम् । प्ली॒ह्न: । य॒क्न: । ते॒ । वि । वृ॒हा॒म॒सि॒ ॥९६.१९॥

पदार्थ : (ते) तेरे (हृदयात्) हृदय से, (क्लोम्नः) फेफड़े से, (हलीक्ष्णात्) पित्ते से, (पार्श्वाभ्यां परि) दोनों काँखों [कक्षाओं] से और (ते) तेरे (मतस्नाभ्याम्) दोनों मतस्नों [गुर्दों] से, (प्लीह्नः) प्लीहा वा पिलई [तिल्ली] से, (यक्नः) यकृत् [काल खण्ड वा कलेजा] से (यक्ष्मम्) क्षयी रोग को (वि वृहामसि) हम उखाड़े देते हैं ॥१९॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१७-२३−व्याख्याताः-अ० २।३३।१-७ ॥