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Atharvaveda / 20 / 100 / 2

वार्ण त्वा॑ य॒व्याभि॒र्वर्ध॑न्ति शूर॒ ब्रह्मा॑णि। वा॑वृ॒ध्वांसं॑ चिदद्रिवो दि॒वेदि॑वे ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 100 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : नृमेधः | देवता : इन्द्रः | छन्द : उष्णिक् | स्वर :

विषय : राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : वा: । न । त्वा॒ । य॒व्याभि॑: । वर्ध॑न्ति । शू॒र॒ । ब्रह्मा॑णि । व॒वृध्वांस॑म् । चि॒त् । आ॒द्रि॒ऽव॒: ॥ दि॒वेऽदि॑वे ॥१००.॥

पदार्थ : (अद्रिवः) हे वज्रधारी (शूर) शूर ! [राजन्] (दिवे दिवे) दिन-दिन (वावृध्वांसम्) बढ़ते हुए (चित्) भी (त्वा) तुझको (ब्रह्माणि) वेदज्ञान (वर्धन्ति) बढ़ाते हैं, (न) जैसे (वाः) जल को (यव्याभिः) जौ आदि अन्न की हित करनेवाली नालियों से [बढ़ाते हैं] ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(वाः) जलम् (न) यथा (त्वा) त्वाम् (यव्याभिः) खलयवमाषतिलवृषब्रह्मणश्च। पा० ।१।७। यव-यत्। यवेभ्यो हिताभिर्जलनालीभिः। नदीभिः। यव्याः नदीनाम-निघ० १।१३। (वर्धन्ति) वर्धयन्ति। उन्नयन्ति (शूर) (ब्रह्माणि) वेदज्ञानानि (वावृध्वांसम्) वर्धतेः क्वसु। वर्धमानम् (चित्) अपि (अद्रिवः) वज्रिन् (दिवे दिवे) दिने दिने ॥