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Atharvaveda / 20 / 107 / 6

त्वे क्रतु॒मपि॑ पृञ्चन्ति॒ भूरि॒ द्विर्यदे॒ते त्रिर्भ॑व॒न्त्यूमाः॑। स्वा॒दोः स्वादी॑यः स्वा॒दुना॑ सृजा॒ सम॒दः सु मधु॒ मधु॑ना॒भि यो॑धीः ॥ 6॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 107 | Paryay : | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : बृहद्दिवोऽथर्वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : १-१२ परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

पदपाठ : त्वे इति॑ । क्रतु॑म् । अपि॑ । पृ॒ञ्च॒न्ति । भूरि॑ । द्वि:। यत् । ए॒ते । त्रि: । भ‍व॑न्ति । ऊमा॑: ॥ स्वा॒दो । स्वादी॑य: । स्वा॒दुना॑ । सृ॒ज॒ । सम् । अ॒द: । सु । मधु॑ । मधु॑ना । अ॒भि । यो॒धी॒: ॥१०७.६॥

पदार्थ : [हे परमात्मन् !] (त्वे अपि) तुझमें ही (क्रतुम्) अपनी बुद्धि को (भूरि) बहुत प्रकार से [सब प्राणी] (पृञ्चन्ति) जोड़ते हैं, (एते) यह सब (ऊमाः) रक्षक प्राणी (द्विः) दो बार [स्त्री-पुरुष रूप से] (त्रिः) तीन-बार [स्थान, नाम और जन्म रूप से] (भवन्ति) रहते हैं। (यत्) क्योंकि (स्वादोः) स्वादु से (स्वादीयः) अधिक स्वादु मोक्ष सुख को (स्वादुना) स्वादु [सांसारिक सुख] के साथ (सम् सृज) संयुक्त कर, (अदः) उस (मधु) मधुर [मोक्ष सुख] को (मधुना) मधुर [सांसारिक] ज्ञान के साथ (सु) भले प्रकार (अभि) सब ओर से (योधीः) तूने पहुँचाया है ॥६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४-१२−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अथ० ।२।१-९ ॥