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Atharvaveda / 20 / 107 / 10

स्तु॒ष्व व॑र्ष्मन्पुरु॒वर्त्मा॑नं॒ समृभ्वा॑णमि॒नत॑ममा॒प्तमा॒प्त्याना॑म्। आ द॑र्शति॒ शव॑सा॒ भूर्यो॑जाः॒ प्र स॑क्षति प्रति॒मानं॑ पृथि॒व्याः ॥ 10॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 107 | Paryay : | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : बृहद्दिवोऽथर्वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : १-१२ परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

पदपाठ : स्तु॒ष्व । व॒र्ष्म॒न् । पु॒रु॒ऽवर्त्मा॑नम् । सम् । ऋभ्वा॑णम् । इ॒न॒त॑मम् । आ॒प्तम् । आ॒प्त्याना॑म् ॥ आ । द॒र्श॒ति॒ । शव॑सा । भूरि॑ऽओजा: । प्र । स॒क्ष॒ति॒ । प्र॒ति॒ऽमान॑म् । पृ॒थि॒व्या: ॥१०७.१०॥

पदार्थ : (वर्ष्मन्) हे ऐश्वर्यवान् पुरुष ! (पुरुवर्त्मानम्) बहुत मार्गवाले (ऋभ्वाणम्) दूर-दूर चमकनेवाले, (इनतमम्) महाप्रभु और (आप्त्यानाम्) आप्त [यथार्थवक्ता] पुरुषों में रहनेवाले गुणों के (आप्तम्) यथार्थवक्ता परमेश्वर की (सम्) यथावत् (स्तुष्व) स्तुति कर। (भूर्योजाः) वह महाबली (शवसा) अपने बल से (आ) सब ओर (दर्शति) देखता है, और वह (पृथिव्याः) पृथिवी का (प्रतिमानम्) प्रतिमान होकर (प्र) भली-भाँति (सक्षति) व्यापता है ॥१०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४-१२−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अथ० ।२।१-९ ॥