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Atharvaveda / 20 / 124 / 4

इ॒मा नु कं॒ भुव॑ना सीषधा॒मेन्द्र॑श्च॒ विश्वे॑ च दे॒वाः। य॒ज्ञं च॑ नस्त॒न्वं᳡ च प्र॒जां चा॑दि॒त्यैरिन्द्रः॑ स॒ह ची॑क्लृपाति ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 124 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : इ॒मा । नु । क॒म् । भुव॑ना । सी॒स॒धा॒म॒ । इन्द्र॑: । च॒ । विश्वे॑ । च॒ । दे॒वा: ॥ य॒ज्ञम् । च॒ । न॒: । त॒न्व॑म् । च॒ । प्र॒ऽजाम् । च॒ । आ॒दि॒त्यै: । इन्द्र॑: । स॒ह । ची॒क्लृ॒पा॒ति॒ ॥१२४.४॥

पदार्थ : (इमा) यह (भुवना) उत्पन्न पदार्थ, (च) और (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला सभापति] (च) और (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग हम (नु) शीघ्र (कम्) सुख को (सीषधाम) सिद्ध करें। (आदित्यैः सह) अखण्ड व्रतधारी विद्वानों के साथ (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला सभापति] (नः) हमारे (यज्ञम्) यज्ञ [मेल-मिलाप आदि] को (च) और (तत्त्वम्) शरीर (च) और (प्रजाम्) प्रजा [सन्तान आदि] को (च) भी (चीक्लृपाति) समर्थ करे ॥४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :मन्त्र ४-६ आचुके हैं-अथ० २०।६३।१-३ ॥ ४-६−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अथ० ६३।१-३ ॥