Atharvaveda / 20 / 125 / 7
स सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ इन्द्रो॑ अ॒स्मदा॒राच्चि॒द्द्वेषः॑ सनु॒तर्यु॑योतु। तस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म ॥7॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 125 | Paryay : | Mantra No : 7
In English:
Seer : surkiitiH | Devta : indraH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : sa sutraamaa svavaa.N indro asmadaaraachchiddveShaH sanutaryuyotu. tasya vaya.m sumatau yaj~niyasyaapi bhadre saumanase syaama .7.
Component Words : saH . su.atraamaa . sva.avaan . indraH . asmat . aaraat . chit . dveShaH . sanutaH . yuyotu . tasya . vayam . su.amatau . yaj~niyasya . api . bhadre . saumanase . syaama .125.7.
In Hindi:
ऋषि : सुर्कीतिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : राजा के धर्म का उपदेश।
पदपाठ : स: । सु॒ऽत्रामा॑ । स्वऽवा॑न् । इन्द्र॑: । अ॒स्मत् । आ॒रात् । चि॒त् । द्वेष॑: । स॒नु॒त: । यु॒यो॒तु॒ ॥ तस्य॑ । व॒यम् । सु॒ऽम॒तौ । य॒ज्ञिय॑स्य । अपि॑ । भ॒द्रे । सौ॒म॒न॒से । स्या॒म॒ ॥१२५.७॥
पदार्थ : (सः) वह (सुत्रामा) बड़ा रक्षक, (स्ववान्) बड़ा धनी, (इन्द्रः) इन्द्र [महाप्रतापी राजा] (अस्मत्) हमसे (आरात् चित्) बहुत ही दूर (द्वेषः) शत्रुओं को (सनुतः) निर्णयपूर्वक (युयोतु) हटावे। (वयम्) हम लोग (तस्य) उस (यज्ञियस्य) पूजा योग्य [राजा] की (अपि) ही (सुमतौ) सुमति में और (भद्रे) कल्याण करनेवाली (सौमनसे) प्रसन्नता में (स्याम) रहें ॥७॥"
भावार्थ : टिप्पणी :६, ७−मन्त्रौ व्याख्यातौ-अथ० ७ सू० ९१, ९२ ॥