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Atharvaveda / 20 / 131 / 20

दौव॑ ह॒स्तिनो॑ दृ॒ती ॥20॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 131 | Paryay : | Mantra No : 20

In Hindi:

ऋषि : | देवता : प्रजापतिर्वरुणो वा | छन्द : याजुष्युष्णिक् | स्वर :

विषय : ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।

पदपाठ : दौव॑ । ह॒स्तिन॑: । दृ॒ती ॥१३१.२०॥

पदार्थ : [जैसे] (हस्तिनः) धौंकनीवाले की (दौव) दोनों (दृती) खालें [धोंकनी फैलती हैं] ॥२०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२०−(दौव) द्वौ (हस्तिनः) हसिमृग्रिण्०। उ० ३।८६। हसे विकाशे-तन्, इनि। हस्त भस्रा। भस्रावतः पुरुषस्य (दृती) दृणातेर्ह्रस्वः। उ० ४।१८४। दृ विदारणे-तिप्रत्ययः, ह्रस्वश्च। द्वे चर्मनिर्मितपात्रे ॥