Atharvaveda / 20 / 132 / 16
नील॑शिखण्ड॒वाह॑नः ॥16॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 132 | Paryay : | Mantra No : 16
In English:
Seer : | Devta : prajaapatiH | Metre : tryavasaanaa ShaTpadaa yathaakShara.m shakvarii, atishakvarii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : niilashikhaNDavaahanaH .16.
Component Words : niilashikhaNDavaahanaH.132.16.
In Hindi:
ऋषि : | देवता : प्रजापतिः | छन्द : प्राजापत्या गायत्री | स्वर :
विषय : परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : नील॑शिखण्ड॒वाह॑न:॥१३२.१६॥
पदार्थ : (हिरण्यः) हिरण्य [तेजोमय], (वा) और (द्वौ) दो (नीलशिखण्डवाहनः) नीलशिखण्ड [नीलों निधियों वा निवास स्थानों का पहुँचानेवाला] तथा वाहन [सब का लेचलनेवाला] है, (इति) ऐसा (ये शिशवः) बालक हैं, (एके) वे कोई कोई (अब्रवीत्) कहते हैं ॥१४-१६॥ "
भावार्थ : टिप्पणी :पण्डित सेवकलाल कृष्णदास संशोधित पुस्तक में मन्त्र १३-१६ का पाठ इस प्रकार है ॥ नील॑शिखण्डो वा हनत् ॥१६॥ (नीलशिखण्डः) नील शिखण्ड [नीलों निधियों वा निवास स्थानों का पहुँचानेवाला परमेश्वर] (वा) निश्चय करके (हनत्) व्यापक है [हन गतौ, गच्छति व्याप्नोति] ॥१६॥