Atharvaveda / 20 / 139 / 2
यद॒न्तरि॑क्षे॒ यद्दि॒वि यत्पञ्च॒ मानु॑षाँ॒ अनु॑। नृ॒म्णं तद्ध॑त्तमश्विना ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 139 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : shashakarNaH | Devta : ashvinau | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yadantarikShe yaddivi yatpa~ncha maanuShaa.N anu. nRRimNa.m taddhattamashvinaa . 2.
Component Words : yat . antarikShe . yat . divi . yat . pa~ncha . maanuShaam . anu . nRRimNam . tat . dhattam . ashvinaa .139.2.
In Hindi:
ऋषि : शशकर्णः | देवता : अश्विनौ | छन्द : गायत्री | स्वर :
विषय : गुरुजनों के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : यत् । अ॒न्तरि॑क्षे । यत् । दि॒वि । यत् । पञ्च॑ । मानु॑षाम् । अनु॑ ॥ नृ॒म्णम् । तत् । ध॒त्त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥१३९.२॥
पदार्थ : (यत्) जो [धन] (अन्तरिक्षे) आकाश में, (यत्) जो (दिवि) सूर्य आदि के प्रकाश में और (यत्) जो (पञ्च) पाँच [पृथिवी आदि पाँच तत्त्वों] से संबन्धवाले (मानुषान् अनु) मनुष्यों में है, (अश्विना) हे दोनों अश्वी ! [चतुर माता-पिता] (तत्) उस (नृम्णम्) धन को (धत्त) दान करो ॥२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२−(यत्) धनम् (अन्तरिक्षे) आकाशे (यत्) (दिवि) सूर्यादिप्रकाशे (यत्) (पञ्च) पृथिव्यादिपञ्चभूतसम्बन्धिनः (मानुषान् अनु) लक्षणे अनोः कर्मप्रवचनीयत्वात्। कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया। पा० २।३।८। इति द्वितीया। मनुष्यान् प्रति (नृम्णम्) धनम् (तत्) तादृशम् (धत्त) दत्त (अश्विना) म० १। हे चतुरमातापितरौ ॥