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Rigveda / 1 / 91 / 14

यः सो॑म स॒ख्ये तव॑ रा॒रण॑द्देव॒ मर्त्य॑:। तं दक्ष॑: सचते क॒विः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 91 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : सोमः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

पदपाठ : यः। सो॒म॒। स॒ख्ये। तव॑। रा॒रण॑त्। दे॒व॒। मर्त्यः॑। तम्। दक्षः॑। स॒च॒ते॒। क॒विः ॥ १.९१.१४

पदार्थ : हे (देव) दिव्यगुणों को प्राप्त करानेवाले वा अच्छे गुणों का हेतु (सोम) वैद्यराज विद्वान् वा यह उत्तम ओषधि ! (यः) जो (तव) आप वा इसके (सख्ये) मित्रपन वा मित्र के काम में (दक्षः) शरीर और आत्मबलयुक्त (कविः) दर्शनीय वा अव्याहत प्रज्ञायुक्त (मर्त्यः) मनुष्य (रारणत्) संवाद करता और (सचते) संबन्ध रखता है (तम्) उस मनुष्य को सुख क्यों न प्राप्त होवें ॥ १४ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो मनुष्य परमेश्वर, विद्वान् वा उत्तम ओषधि के साथ मित्रपन करते हैं, वे विद्या को प्राप्त होके कभी दुःखभागी नहीं होते ॥ १४ ॥