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Rigveda / 1 / 92 / 18

एह दे॒वा म॑यो॒भुवा॑ द॒स्रा हिर॑ण्यवर्तनी। उ॒ष॒र्बुधो॑ वहन्तु॒ सोम॑पीतये ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 92 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : उषाः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर वे अग्नि और पवन कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : आ। इ॒ह। दे॒वा। म॒यः॒ऽभुवा॑। द॒स्रा। हिर॑ण्यवर्तनी॒ इति॒ हिर॑ण्यऽवर्तनी। उ॒षः॒ऽबुधः॑। व॒ह॒न्तु॒। सोम॑ऽपीतये ॥ १.९२.१८

पदार्थ : हे मनुष्यो ! आप लोग जो (देवा) दिव्यगुणयुक्त (मयोभुवा) सुख की भावना करानेहारे (हिरण्यवर्त्तनी) प्रकाश के वर्त्ताव को रखते और (दस्रा) विद्या के उपयोग को प्राप्त हुए समस्त दुःख का विनाश करनेवाले अग्नि, पवन (उषर्बुधः) प्रातःकाल की वेला को जतानेहारी सूर्य्य की किरणों को प्रकट करते हैं, उनसे (सोमपीतये) जिस व्यवहार में पुष्टि, शान्त्यादि तथा गुणवाले पदार्थों का पान किया जाता है, उसके लिये सब मनुष्यों को सामर्थ्य (इह) इस संसार में (आवहन्तु) अच्छे प्रकार प्राप्त करावें ॥ १८ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि उत्पन्न हुए दिनों में भी अग्नि और पवन के विना पदार्थ भोगना नहीं हो सकता, इससे अग्नि और पवन से उपयोग लेने का पुरुषार्थ नित्य करें ॥ १८ ॥इस सूक्त में उषा और अश्वि पदार्थों के गुणों के वर्णन से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ इस सूक्तार्थ की सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह ९२ बानवाँ सूक्त और २७ सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥