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Rigveda / 1 / 93 / 2

अग्नी॑षोमा॒ यो अ॒द्य वा॑मि॒दं वच॑: सप॒र्यति॑। तस्मै॑ धत्तं सु॒वीर्यं॒ गवां॒ पोषं॒ स्वश्व्य॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 93 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणपुत्रः | देवता : अग्नीषोमौ | छन्द : भुरिगुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अग्नी॑षोमा। यः। अ॒द्य। वा॒म्। इ॒दम्। वचः॑। स॒प॒र्यति॑। तस्मै॑। ध॒त्त॒म्। सु॒ऽवीर्य॑म्। गवा॑म्। पोष॑म्। सु॒ऽअश्व्य॑म् ॥ १.९३.२

पदार्थ : हे (अग्नीषोमा) पढ़ाने और परीक्षा लेनेवाले विद्वानो ! (यः) जो पढ़नेवाला (अद्य) आज (वाम्) तुम्हारे (इदम्) इस (वचः) विद्या के वचन को (सपर्यति) सेवे (तस्मै) उसके लिये (स्वश्व्यम्) जो अच्छे-अच्छे घोड़ों से युक्त (सुवीर्य्यम्) उत्तम-उत्तम बल जिस विद्याभ्यास से हों, उस (गवाम्) इन्द्रिय और गाय आदि पशुओं के (पोषम्) सर्वथा शरीर और आत्मा की पुष्टि करनेहारे सुख को (धत्तम्) दीजिये ॥ २ ॥

भावार्थ : जो ब्रह्मचारी विद्या के लिये पढ़ाने और परीक्षा करनेवालों के प्रति उत्तम प्रीति को करके और उनकी नित्य सेवा करता है, वही बड़ा विद्वान् होकर सब सुखों को पाता है ॥ २ ॥