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Rigveda / 1 / 93 / 4

अग्नी॑षोमा॒ चेति॒ तद्वी॒र्यं॑ वां॒ यदमु॑ष्णीतमव॒सं प॒णिं गाः। अवा॑तिरतं॒ बृस॑यस्य॒ शेषोऽवि॑न्दतं॒ ज्योति॒रेकं॑ ब॒हुभ्य॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 93 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणपुत्रः | देवता : अग्नीषोमौ | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वे कैसे हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अग्नी॑षोमा। चेति॑। तत्। वी॒र्य॑म्। वा॒म्। यत्। अमु॑ष्णीतम्। अ॒व॒सम्। प॒णिम्। गाः। अव॑। अ॒ति॒र॒त॒म्। बृस॑यस्य। शेषः॑। अवि॑न्दतम्। ज्योतिः॑। एक॑म्। ब॒हुऽभ्यः॑ ॥ १.९३.४

पदार्थ : जो (अग्नीषोमा) वायु और विद्युत् (यत्) जिस (अवसम्) रक्षा आदि (पणिम्) व्यवहार को (अमुष्णीतम्) चोरते प्रसिद्धाप्रसिद्ध ग्रहण करते (गाः) सूर्य्य की किरणों का विस्तार कर (अवातिरतम्) अन्धकार का विनाश करते (बहुभ्यः) अनेकों पदार्थों से (एकम्) एक (ज्योतिः) सूर्य के प्रकाश को (अविन्दतम्) प्राप्त कराते हैं, जिनके (बृसयस्य) ढाँपनेवाले सूर्य का (शेषः) अवशेष भाग लोकों को प्राप्त होता है (वाम्) इनका (तत्) वह (वीर्य्यम्) पराक्रम (चेति) विदित है अर्थात् सब कोई जानते हैं ॥ ४ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि जितना प्रसिद्ध अन्धकार को ढाँप देने और सबलोकों को प्रकाशित करनेहारा तेज होता है, उतना सब कारणरूप पवन और बिजुली की उत्तेजना से होता है ॥ ४ ॥