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Rigveda / 1 / 94 / 6

त्वम॑ध्व॒र्युरु॒त होता॑सि पू॒र्व्यः प्र॑शा॒स्ता पोता॑ ज॒नुषा॑ पु॒रोहि॑तः। विश्वा॑ वि॒द्वाँ आर्त्वि॑ज्या धीर पुष्य॒स्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 94 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : कुत्सः आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वे ईश्वर और सभाध्यक्ष कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : त्वम्। अ॒ध्व॒र्युः। उ॒त। होता॑। अ॒सि॒। पू॒र्व्यः। प्र॒ऽशा॒स्ता। पोता॑। ज॒नुषा॑। पु॒रःऽहि॑तः। विश्वा॑। वि॒द्वान्। आर्त्वि॑ज्या। धी॒र॒। पु॒ष्य॒सि॒। अग्ने॑। स॒ख्ये। मा। रि॒षा॒म॒। व॒यम्। तव॑ ॥ १.९४.६

पदार्थ : हे (धीर) धारणा आदि गुणयुक्त (अग्ने) उत्तम ज्ञान देनेवाले परमेश्वर वा सभाध्यक्ष ! जिस कारण (पूर्व्यः) पिछले महाशयों के किये और चाहे हुए (अध्वर्युः) यज्ञ के यथोक्त व्यवहार से युक्त करने, वर्त्तने और चाहने (होता) देने-लेने (प्रशास्ता) धर्म, उत्तम शिक्षा और उपदेश का प्रचार करने (पोता) पवित्र और दूसरों को पवित्र करने (पुरोहितः) हित प्रसिद्ध करने और (विद्वान्) यथावत् जाननेहारे (त्वम्) आप (असि) हैं (उत) और (जनुषा) उत्पन्न हुए जगत् के साथ (विश्वा) समग्र (आर्त्विज्या) ऋत्विजों के गुणप्रकाशक कामों को (पुष्यसि) दृढ़ करते-कराते हैं, इससे (तव) आपके (सख्ये) मित्रपन में (वयम्) हम लोग (मा, रिषाम) दुःखी कभी न होवें ॥ ६ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सबके अधिष्ठाता जगदीश्वर वा विद्वानों के विना जगत् के पालने आदि व्यवहारों के होने का संभव नहीं होता, इससे मनुष्यों को चाहिये कि दिन-रात ईश्वर की उपासना और इन विद्वानों का सङ्ग करके सुखी हों ॥ ६ ॥