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Rigveda / 1 / 94 / 12

अ॒यं मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाय॑सेऽवया॒तां म॒रुतां॒ हेळो॒ अद्भु॑तः। मृ॒ळा सु नो॒ भूत्वे॑षां॒ मन॒: पुन॒रग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 94 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : कुत्सः आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब सभा आदि के अधिपति के गुणों का उपदेश करते हैं ।

पदपाठ : अ॒यम्। मि॒त्रस्य॑। वरु॑णस्य। धाय॑से। अ॒व॒ऽया॒ताम्। म॒रुता॒म्। हेळः॑। अद्भु॑तः। मृ॒ळ। सु। नः॒। भूतु॑। ए॒षा॒म्। मनः॑। पुनः॑। अग्ने॑। स॒ख्ये। मा। रि॒षा॒म॒। व॒यम्। तव॑ ॥ १.९४.१२

पदार्थ : हे (अग्ने) समस्त ज्ञान देनेहारे सभा आदि के अधिपति ! जिस कारण आपने (मित्रस्य) मित्र वा (वरुणस्य) श्रेष्ठ के (धायसे) धारण वा सन्तोष के लिये जो (अयम्) यह प्रत्यक्ष (अवयाताम्) धर्मविरोधी (मरुताम्) मरने जीनेवाले मनुष्यों का (अद्भुतः) अद्भुत (हेळः) अनादर किया है, उससे (एषाम्) इन (नः) हम लोगों के (मनः) मन को (पुनः) बार-बार (सुमृड) अच्छे प्रकार आनन्दित करो, ऐसे (भूतु) हो, इससे (तव) तुम्हारे (सख्ये) मित्रपन में (वयम्) हम लोग (मा, रिषाम) मत बेमन हों ॥ १२ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि सभाध्यक्ष का जो श्रेष्ठों का पालन और दुष्टों को ताड़ना देना कर्म है, उसको जानकर सदा आचरण करें ॥ १२ ॥