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Rigveda / 1 / 96 / 5

नक्तो॒षासा॒ वर्ण॑मा॒मेम्या॑ने धा॒पये॑ते॒ शिशु॒मेकं॑ समी॒ची। द्यावा॒क्षामा॑ रु॒क्मो अ॒न्तर्वि भा॑ति दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 96 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कुत्सः आङ्गिरसः | देवता : द्रविणोदा अग्निः शुद्धोऽग्निर्वा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : नक्तो॒षासा॑। वर्ण॑म्। आ॒मेम्या॑ने॒ इत्या॒ऽमेम्या॑ने। धा॒पये॑ते॒ इति॑। शिशु॑म्। एक॑म्। स॒मी॒ची॒ इति॑ स॒म्ऽई॒ची। द्यावा॒क्षामा॑। रु॒क्मः। अ॒न्तः। वि। भा॒ति॒। दे॒वाः। अ॒ग्निम्। धा॒र॒य॒न्। द्र॒वि॒णः॒ऽदाम् ॥ १.९६.५

पदार्थ : हे मनुष्यलोगो ! जिसकी सृष्टि में (वर्णम्) स्वरूप अर्थात् उत्पन्नमात्र को (आमेम्याने) बार-बार विनाश न करते हुए (समीची) सङ्ग को प्राप्त (नक्तोषासा) रात्रि-दिवस वा (द्यावाक्षामा) सूर्य्य और भूमिलोक (शिशुम्) बालक को (धापयेते) दुग्धपान करानेवाले माता-पिता के समान रस आदि का पान करवाते हैं, जिसकी उत्पन्न की बिजुली से युक्त (रुक्मः) आप ही प्रकाशस्वरूप प्राण (अन्तः) सबके बीच (वि, भाति) विशेष प्रकाश को प्राप्त होता है, जिस (द्रविणोदाम्) धनादि पदार्थ देनेहारे के समान (एकम्) अद्वितीयमात्र स्वरूप (अग्निम्) परमेश्वर को (देवाः) आप्त विद्वान् जन (धारयन्) धारणा करते वा कराते हैं, वही सबका पिता है ॥ ५ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे दूध पिलानेहारे बालक के समीप में स्थित दो स्त्रियाँ उस बालक को दूध पिलाती हैं, वैसे ही दिन और रात्रि तथा सूर्य और पृथिवी हैं, जिसके नियम से ऐसा होता है, वह सबका उत्पन्न करनेवाला कैसे न हो ॥ ५ ॥