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Rigveda / 1 / 96 / 9

ए॒वा नो॑ अग्ने स॒मिधा॑ वृधा॒नो रे॒वत्पा॑वक॒ श्रव॑से॒ वि भा॑हि। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 96 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : कुत्सः आङ्गिरसः | देवता : द्रविणोदा अग्निः शुद्धोऽग्निर्वा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ए॒व। नः॒। अ॒ग्ने॒। स॒म्ऽइधा॑। वृ॒धा॒नः। रे॒वत्। पा॒व॒क॒। श्रव॑से। वि। भा॒हि॒। तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। म॒म॒ह॒न्ता॒म्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः ॥ १.९६.९

पदार्थ : हे (पावक) आप पवित्र और संसार को पवित्र करने तथा (अग्ने) समस्त मङ्गल प्रकट करनेवाले परमेश्वर ! (समिधा) जिससे समस्त व्यवहार प्रकाशित होते हैं, उस वेदविद्या से (वृधानः) नित्यवृद्धियुक्त जो आप (नः) हमलोगों को (रेवत्) राज्य आदि प्रशंसित श्रीमान् के लिये वा (श्रवसे) समस्त विद्या की सुनावट और अन्नों की प्राप्ति के लिये (एव) ही (वि, भाहि) अनेक प्रकार से प्रकाशमान कराते हैं (तत्) उन आपके बनाये हुए (मित्रः) ब्रह्मचर्य्य के नियम से बल को प्राप्त हुआ प्राण (वरुणः) ऊपर को उठानेवाला उदान वायु (अदितिः) अन्तरिक्ष (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) भूमि (उत) और (द्यौः) प्रकाशमान सूर्य्य आदि लोक (नः) हम लोगों के (मामहन्ताम्) सत्कार के हेतु हों ॥ ९ ॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जिसकी विद्या के विना यथार्थ विज्ञान नहीं होता वा जिसने भूमि से लेके आकाशपर्यन्त सृष्टि बनाई है और हम लोग जिसकी उपासना करते हैं, तुमलोग भी उसी की उपासना करो ॥ ९ ॥इस सूक्त में अग्नि शब्द के गुणों के वर्णन से इसके अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह छानवाँ सूक्त और चौथा वर्ग पूरा हुआ ॥