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Rigveda / 1 / 100 / 1

स यो वृषा॒ वृष्ण्ये॑भि॒: समो॑का म॒हो दि॒वः पृ॑थि॒व्याश्च॑ स॒म्राट्। स॒ती॒नस॑त्वा॒ हव्यो॒ भरे॑षु म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 100 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब उन्नीस ऋचावाले सौवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में सूर्य्यलोक कैसा है, यह विषय कहा है ।

पदपाठ : सः। यः। वृषा॑। वृष्ण्ये॑भिः॑। सम्ऽओ॑काः। म॒हः। दि॒वः। पृ॒थि॒व्याः। च॒। स॒म्ऽराट्। स॒ती॒नऽस॑त्वा। हव्यः॑। भरे॑षु। म॒रुत्वा॑न्। नः॒। भ॒व॒तु॒। इन्द्रः॑। ऊ॒ती ॥ १.१००.१

पदार्थ : हे मनुष्यो ! तुम (यः) जो (वृषा) वर्षा का हेतु (समोकाः) जिसमें समीचीन निवास के स्थान हैं (सतीनसत्वा) जो जल को इकठ्ठा करता (हव्यः) और ग्रहण करने योग्य (मरुत्वान्) जिसके प्रशंसित पवन हैं जो (महः) अत्यन्त (दिवः) प्रकाश तथा (पृथिव्याः) भूमिलोक (च) और समस्त मूर्त्तिमान् लोकों वा पदार्थों के बीच (सम्राट्) अच्छा प्रकाशमान (इन्द्रः) सूर्य्यलोक है (सः) वह जैसे (वृष्ण्येभिः) उत्तमता में प्रकट होनेवाली किरणों से (भरेषु) पालन और पुष्टि करानेवाले पदार्थों में (नः) हमारे (ऊती) रक्षा आदि व्यवहारों के लिये (भवतु) होता है वैसे उत्तम-उत्तम यत्न करो ॥ १ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो परिमाण से बड़ा, वायुरूप कारण से प्रकट और प्रकाशस्वरूप सूर्य्यलोक है, उससे विद्यापूर्वक अनेक उपकार लेवें ॥ १ ॥