Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 101 / 6

यः शूरे॑भि॒र्हव्यो॒ यश्च॑ भी॒रुभि॒र्यो धाव॑द्भिर्हू॒यते॒ यश्च॑ जि॒ग्युभि॑:। इन्द्रं॒ यं विश्वा॒ भुव॑ना॒भि सं॑द॒धुर्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 101 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यः। शूरे॑भिः। हव्यः॑। यः। च॒। भी॒रुऽभिः॑। यः। धाव॑त्ऽभिः। हू॒यते॑। यः। च॒। जि॒ग्युभिः॑। इन्द्र॑म्। यम्। विश्वा॑। भुव॑ना। अ॒भि। स॒म्ऽद॒धुः। म॒रुत्व॑न्तम्। स॒ख्याय॑। ह॒वा॒म॒हे॒ ॥ १.१०१.६

पदार्थ : (यः) जो परमैश्वर्यवान् सेना आदि का अधिपति (शूरेभिः) शूरवीरों से (हव्यः) आह्वान करने अर्थात् चाहने योग्य (यः) जो (भीरुभिः) डरनेवालों (च) और निर्भयों से तथा (यः) जो (धावद्भिः) दौड़ते हुए मनुष्यों से वा (यः) जो (च) बैठे और चलते हुए उनसे (जिग्युभिः) वा जीतनेवाले लोगों से (हूयते) बुलाया जाता वा (यम्) जिस (इन्द्रम्) उक्त सेनाध्यक्ष को (विश्वा) समस्त (भुवना) लोकस्थ प्राणी (अभि) सम्मुखता से (संदधुः) अच्छे प्रकार धारण करते हैं, उस (मरुत्वन्तम्) अच्छे पढ़ानेवालों को रखनेहारे सेनाधीश को (सख्याय) मित्रपन के लिये हम लोग (हवामहे) स्वीकार करते हैं, उसको तुम भी स्वीकार करो ॥ ६ ॥

भावार्थ : जो परमात्मा और सेना का अधीश सब लोकों का सब प्रकार से मेल करता है, वह सबको सेवन करने और मित्रभाव से मानने के योग्य है ॥ ६ ॥