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Rigveda / 1 / 104 / 2

ओ त्ये नर॒ इन्द्र॑मू॒तये॑ गु॒र्नू चि॒त्तान्त्स॒द्यो अध्व॑नो जगम्यात्। दे॒वासो॑ म॒न्युं दास॑स्य श्चम्न॒न्ते न॒ आ व॑क्षन्त्सुवि॒ताय॒ वर्ण॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 104 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ओ इति॑। त्ये। नरः॑। इन्द्र॑म्। ऊ॒तये॑। गुः॒। नु। चि॒त्। तान्। स॒द्यः। अध्व॑नः। ज॒ग॒म्या॒त्। दे॒वासः॑। म॒न्युम्। दास॑स्य। श्च॒म्न॒न्। ते। नः॒। आ। व॒क्ष॒न्। सु॒ऽवि॒ताय। वर्ण॑म् ॥ १.१०४.२

पदार्थ : (त्ये) जो (नरः) सज्जन (ऊतये) रक्षा के लिये (इन्द्रम्) सभा सेना आदि के अधीश के (सद्यः) शीघ्र (ओ, गुः) सम्मुख प्राप्त होते हैं (तान्) उनको (चित्) भी यह सभापति (अध्वनः) श्रेष्ठ मार्गों को (जगम्यात्) निरन्तर पहुँचावे। तथा जो (देवासः) विद्वान् जन (दासस्य) अपने सेवक के (मन्युम्) क्रोध को (श्चम्नन्) निवृत्त करें (ते) वे (नः) हम लोगों की (सुविताय) प्रेरणा को प्राप्त हुए दास के लिये (वर्णम्) आज्ञापालन करने को (नु) शीघ्र (आ, वक्षन्) पहुँचावें ॥ २ ॥

भावार्थ : जो प्रजा वा सेना के जन सत्य के राखने को सभा आदि के अधीशों के शरण को प्राप्त हों, उनकी वे यथावत् रक्षा करें। जो विद्वान् लोग वेद और उत्तम शिक्षाओं से मनुष्यों के क्रोध आदि दोषों को निवृत्तकर शान्ति आदि गुणों का सेवन करावें, वे सबको सेवन करने के योग्य हैं ॥ २ ॥