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Rigveda / 1 / 104 / 4

यु॒योप॒ नाभि॒रुप॑रस्या॒योः प्र पूर्वा॑भिस्तिरते॒ राष्टि॒ शूर॑:। अ॒ञ्ज॒सी कु॑लि॒शी वी॒रप॑त्नी॒ पयो॑ हिन्वा॒ना उ॒दभि॑र्भरन्ते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 104 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वे कैसे वर्ताव वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यु॒योप॑। नाभिः॑। उप॑रस्य। आ॒योः। प्र। पूर्वा॑भिः। ति॒र॒ते॒। राष्टि॑। शूरः॑। अ॒ञ्ज॒सी। कु॒लि॒शी। वी॒रऽप॑त्नी। पयः॑। हि॒न्वा॒नाः। उ॒दऽभिः॑। भ॒र॒न्ते॒ ॥ १.१०४.४

पदार्थ : जब (शूरः) निडर शत्रुओं का मारनेवाला शूरवीर (प्र, पूर्वाभिः) प्रजाजनों के साथ (तिरते) राज्य का यथावत् न्याय कर पार होता और (राष्टि) उस राज्य में प्रकाशित होता है तब (आयोः) प्राप्त होने योग्य (उपरस्य) मेघ की (नाभिः) बन्धन चारों ओर से घुमड़ी हुई बादलों की दवन (युयोप) सबको मोहित करती है अर्थात् राजधर्म से प्रजासुख के लिये जलवर्षा भी होती है वह थोड़ी नहीं किन्तु (अञ्जसी) प्रसिद्ध (कुलिशी) जो सूर्य के किरणरूपी वज्र से सब प्रकार रही हुई अर्थात् सूर्य के विकट आतप से सूखने से बची हुई (वीरपत्नी) बड़ी-बड़ी नदी जिनसे बड़ा वीर समुद्र ही है वे (पयः) जल को (हिन्वानाः) हिड़ोलती हुई (उदभिः) जलों से (भरन्ते) भर जाती हैं ॥ ४ ॥

भावार्थ : अच्छे राज्य से सब सुख प्रजा में होता है और विना अच्छे राज्य के दुःख और दुर्भिक्ष आदि उपद्रव होते हैं, इससे वीरपुरुषों को चाहिये कि रीति से राज्य पालन करें ॥ ४ ॥