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Rigveda / 1 / 105 / 1

च॒न्द्रमा॑ अ॒प्स्व१॒॑न्तरा सु॑प॒र्णो धा॑वते दि॒वि। न वो॑ हिरण्यनेमयः प॒दं वि॑न्दन्ति विद्युतो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 105 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब एकसौ पाँचवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में चन्द्रलोक कैसा है, इस विषय को कहा है ।

पदपाठ : च॒न्द्रमाः॑। अ॒प्ऽसु। अ॒न्तः। आ। सु॒ऽप॒र्णः। धा॒व॒ते॒। दि॒वि। न। वः॒। हि॒र॒ण्य॒ऽने॒म॒यः॒। प॒दम्। वि॒न्द॒न्ति॒। वि॒ऽद्यु॒तः॒। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥ १.१०५.१

पदार्थ : हे (रोदसी) सूर्यप्रकाश वा भूमि के तुल्य राज और प्रजा जनसमूह ! (मे) मुझ पदार्थ विद्या जाननेवाले की उत्तेजना से जो (अप्सु) प्राणरूपी पवनों के (अन्तः) बीच (सुपर्णः) अच्छा गमन करने वा (चन्द्रमाः) आनन्द देनेवाला चन्द्रलोक (दिवि) सूर्य के प्रकाश में (आ, धावते) अति शीघ्र घूमता है और (हिरण्यनेमयः) जिनको सुवर्णरूपी चमक-दमक चिलचिलाहट है वे (विद्युतः) बिजुली लपट-झपट से दौड़ती हुई (वः) तुम लोगों की (पदम्) विचारवाली शिल्प चतुराई को (न) नहीं (विन्दन्ति) पाती हैं अर्थात् तुम उनको यथोचित काम में नहीं लाते हो (अस्य) इस पूर्वोक्त विषय को तुम (वित्तम्) जानो ॥ १ ॥

भावार्थ : हे राजा और प्रजा के पुरुष ! जो चन्द्रमा की छाया और अन्तरिक्ष के जल के संयोग से शीतलता का प्रकाश है उसको जानो तथा जो बिजुली लपट-झपट से दमकती हैं वे आखों से देखने योग्य हैं और जो विलाय जाती हैं उनका चिह्न भी आँख से देखा नहीं जा सकता, इस सबको जानकर सुख को उत्पन्न करो ॥ १ ॥