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Rigveda / 1 / 105 / 3

मो षु दे॑वा अ॒दः स्व१॒॑रव॑ पादि दि॒वस्परि॑। मा सो॒म्यस्य॑ श॒म्भुव॒: शूने॑ भूम॒ कदा॑ च॒न वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 105 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : इस जगत् में विद्वान् जन कैसे पूछने के योग्य हैं, यह अगले मन्त्र में उपदेश किया है ।

पदपाठ : मो इति॑। सु। दे॒वाः॒। अ॒दः। स्वः॑। अव॑। पा॒दि॒। दि॒वः। परि॑। मा। सो॒म्यस्य॑। श॒म्ऽभुवः॑। शूने॑। भू॒म॒। कदा॑। च॒न। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥ १.१०५.३

पदार्थ : हे (देवाः) विद्वानो ! तुम लोगों से (दिवः) सूर्य के प्रकाश से (परि) ऊपर (अदः) वह प्राप्त होनेहारा (स्वः) सुख (कदा, चन) कभी (मो, अव, पादि) विरुद्ध न उत्पन्न हुआ है। हम लोग (सोम्यस्य) ऐश्वर्य के योग्य (शंभुवः) सुख जिससे हो उस व्यवहार की (सु शूने) सुन्दर उन्नति में विरुद्ध भाव से चलनेहारे कभी (मा) (भूम) मत होवें। और अर्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये ॥ ३ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि इस संसार में धर्म और सुख से विरुद्ध काम नहीं करें और पुरुषार्थ से निरन्तर सुख की उन्नति करें ॥ ३ ॥