Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 105 / 5

अ॒मी ये दे॑वा॒: स्थन॑ त्रि॒ष्वा रो॑च॒ने दि॒वः। कद्व॑ ऋ॒तं कदनृ॑तं॒ क्व॑ प्र॒त्ना व॒ आहु॑तिर्वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 105 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर ये परस्पर कैसे क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अ॒मी इति॑। ये। दे॒वः॒। स्थन॑। त्रि॒षु। आ। रो॒च॒ने। दि॒वः। कत्। वः॒। ऋ॒तम्। कत्। अनृ॑तम्। क्व॑। प्र॒त्ना। वः॒। आऽहु॑तिः। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥ १.१०५.५

पदार्थ : हे विद्वानो ! तुम (दिवः) प्रकाश करनेवाले सूर्य्य के (रोचने) प्रकाश में (त्रिषु) तीन अर्थात् नाम, स्थान और जन्म में (अमी) प्रकट और अप्रकट (ये) जो (देवाः) दिव्य गुणवाले पृथिवी आदि लोक (आ) अच्छी (स्थन) स्थिति करते हैं (वः) इनके बीच (ऋतम्) सत्य कारण (कत्) कहाँ और (अनृतम्) झूठे कार्यरूप (कत्) कहाँ और (वः) उनके (प्रत्ना) पुराने पदार्थ तथा उनका (आहुतिः) होम अर्थात् विनाश (क्व) कहाँ होता है, इन सब प्रश्नों के उत्तर कहो ? शेष मन्त्र का अर्थ पूर्व के तुल्य जानना चाहिये ॥ ५ ॥

भावार्थ : प्रश्न−जब सब लोकों की आहुति अर्थात् प्रलय होता है तब कार्य्यकारण और जीव कहाँ ठहरते हैं ? इसका उत्तर−सर्वव्यापी ईश्वर और आकाश में कारण रूप से सब जगत् और अच्छी गाढ़ी नींद में सोते हुए के समान जीव रहते हैं। एक-एक सूर्य्य के प्रकाश और आकर्षण के विषय में जितने-जितने लोक हैं, उतने-उतने सब ईश्वर ने बनाये धारण किये तथा इनकी व्यवस्था की है, यह जानना चाहिये ॥ ५ ॥