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Rigveda / 1 / 106 / 5

बृह॑स्पते॒ सद॒मिन्न॑: सु॒गं कृ॑धि॒ शं योर्यत्ते॒ मनु॑र्हितं॒ तदी॑महे। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 106 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : बृह॑स्पते। सद॑म्। इत्। नः॒। सु॒ऽगम्। कृ॒धि॒। शम्। योः। यत्। ते॒। मनुः॑ऽहितम्। तत्। ई॒म॒हे॒। रथ॑म्। न। दुः॒ऽगात्। व॒स॒वः॒। सु॒ऽदा॒नवः॒। विश्व॑स्मात्। नः॒। अंह॑सः। निः। पि॒प॒र्त॒न॒ ॥ १.१०६.५

पदार्थ : हे (बृहस्पते) परम अध्यापक अर्थात् उत्तम रीति से पढ़ानेवाले ! (ते) आपका जो (मनुर्हितम्) मन का हित करनेवाला (शम्) सुख वा (योः) धर्म, अर्थ और मोक्ष की प्राप्ति कराना है तथा (यत्) जो (सदम् इत्) सदैव तुम (नः) हमारे लिये (सुगम्) सुख (कृधि) करो अर्थात् सिद्ध करो (तत्) उस उक्त समस्त को हम लोग (ईमहे) माँगते हैं। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य समझना चाहिये ॥ ५ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि जैसे गुरुजन से विद्या ली जाती है, वैसे ही सब विद्वानों से विद्या लेकर दुःखों का विनाश करें ॥ ५ ॥