Rigveda / 1 / 107 / 2
उप॑ नो दे॒वा अव॒सा ग॑म॒न्त्वङ्गि॑रसां॒ साम॑भिः स्तू॒यमा॑नाः। इन्द्र॑ इन्द्रि॒यैर्म॒रुतो॑ म॒रुद्भि॑रादि॒त्यैर्नो॒ अदि॑ति॒: शर्म॑ यंसत् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 107 | Mantra No : 2
In English:
Seer : kutsa aa~NgirasaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : upa no devaa avasaa gamantva~Ngirasaa.m saamabhiH stuuyamaanaaH. indra indriyairmaruto marudbhiraadityairno aditiH sharma ya.msat .
Component Words : upa. naH. devaaH. avasaa. aa. gamantu. a~Ngirasaam. saama.abhiH. stuuyamaanaaH. indraH. indriyaiH. marutaH. marut.abhiH. aadityaiH. naH. aditiH. sharma. ya.msat . 1.107.2
In Hindi:
ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : उप॑। नः॒। दे॒वाः। अव॑सा। आ। ग॒म॒न्तु॒। अङ्गि॑रसाम्। साम॑ऽभिः। स्तू॒यमा॑नाः। इन्द्रः॑। इ॒न्द्रि॒यैः। म॒रुतः॑। म॒रुत्ऽभिः॑। आ॒दि॒त्यैः। नः॒। अदि॑तिः। शर्म॑। यं॒स॒त् ॥ १.१०७.२
पदार्थ : (सामभिः) सामवेद के गानों से (स्तूयमानाः) स्तुति को प्राप्त होते हुए (आदित्यैः) पूर्ण विद्यायुक्त मनुष्य वा बारह महीनों (मरुद्भिः) विद्वानों वा पवनों और (इन्द्रियैः) धनों के सहित (इन्द्रः) सभाध्यक्ष (मरुतः) वा पवन (अदितिः) विद्वानों का पिता वा सूर्य्य प्रकाश और (देवाः) विद्वान् जन (अङ्गिरसाम्) प्राणविद्या के जाननेवालों (नः) हम लोगों के (अवसा) रक्षा आदि व्यवहार से (उप, आ, गमन्तु) समीप में सब प्रकार से आवें और (नः) हम लोगों के लिये (शर्म) सुख (यंसत्) देवें ॥ २ ॥
भावार्थ : ज्ञानप्रचार सीखनेहारे जन जिन विद्वानों के समीप वा विद्वान् जन जिन विद्यार्थियों के समीप जावें, वे विद्या, धर्म और अच्छी शिक्षा के व्यवहार को छोड़कर और कर्म कभी न करें, जिससे दुःख की हानि होके निरन्तर सुख की सिद्धि हो ॥ २ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते ।
पदपाठ : उप॑। नः॒। दे॒वाः। अव॑सा। आ। ग॒म॒न्तु॒। अङ्गि॑रसाम्। साम॑ऽभिः। स्तू॒यमा॑नाः। इन्द्रः॑। इ॒न्द्रि॒यैः। म॒रुतः॑। म॒रुत्ऽभिः॑। आ॒दि॒त्यैः। नः॒। अदि॑तिः। शर्म॑। यं॒स॒त् ॥ १.१०७.२
पदार्थ : (उप) सामीप्ये (नः) अस्माकम् (देवाः) विद्वांसः (अवसा) रक्षणादिना (आ) सर्वतः (गमन्तु) गच्छन्तु (अङ्गिरसाम्) प्राणविद्याविदाम् (सामभिः) सामवेदस्थैर्गानैः (स्तूयमानाः) (इन्द्रः) सभाद्यध्यक्षः (इन्द्रियैः) धनैः (मरुतः) पवनाः (मरुद्भिः) विद्वद्भिः पवनैर्वा (आदित्यैः) पूर्णविद्यैर्मनुष्यैर्द्वादशभिर्मासैर्वा सह (नः) अस्मभ्यम् (अदितिः) विद्वत्पिता सूर्यदीप्तिर्वा (शर्म्म) सुखम् (यंसत्) यच्छन्तु प्रददतु। अत्र वचनव्यत्ययेन बहुवचनस्थान एकवचनम् ॥ २ ॥
अन्वय : सामभिः स्तूयमाना आदित्यैर्मरुद्भिरिन्द्रियैः सहेन्द्रो मरुतोऽदितिर्देवाश्चाङ्गिरसां नोऽस्माकमवसोपागमन्तु ते नोऽस्मभ्यं शर्म्म यंसत् प्रददतु ॥ २ ॥
भावार्थ : जिज्ञासवो येषां विदुषां विद्वांसो वा जिज्ञासूनां सामीप्यं गच्छेयुस्ते नैव विद्याधर्मसुशिक्षाव्यवहारं विहायान्यत्कर्म कदाचित्कुर्य्युः। यतो दुःखहान्या सुखं सततं सिध्येत् ॥ २ ॥