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Rigveda / 1 / 108 / 13

ए॒वेन्द्रा॑ग्नी पपि॒वांसा॑ सु॒तस्य॒ विश्वा॒स्मभ्यं॒ सं ज॑यतं॒ धना॑नि। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 108 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब धनपति और सेनापति कैसे हैं, यह अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ए॒व। इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑। प॒पि॒ऽवांसा॑। सु॒तस्य॑। विश्वा॑। अ॒स्मभ्य॑म्। सम्। ज॒यत॒म्। धना॑नि। तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। म॒म॒ह॒न्ता॒म्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः ॥ १.१०८.१३

पदार्थ : (मित्रः) मित्र (वरुणः) श्रेष्ठ गुणयुक्त (अदितिः) उत्तम विद्वान् (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) पृथिवी (उत) और (द्यौः) सूर्य का प्रकाश जिनको (नः) हम लोगों के लिये (मामहन्ताम्) बढ़ावें (तत्, एव) उन्हीं (विश्वा) समस्त (धनानि) धनों को (सुतस्य) पदार्थों के निकाले हुए रस को (पपिवांसा) पिये हुए (इन्द्राग्नी) अति धनी वा युद्धविद्या में कुशल वीरजन (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (संजयतम्) अच्छी प्रकार जीतें अर्थात् सिद्ध करें ॥ १३ ॥

भावार्थ : विद्वान्, बलिष्ठ, धार्मिक, कोशस्वामी और सेनाध्यक्ष और उत्तम पुरुषार्थ करनेवालों के विना विद्या आदि धन नहीं बढ़ सकते हैं। जैसे मित्र आदि अपने मित्रों के लिये सुख देते हैं वैसे ही कोशस्वामी और सेनाध्यक्ष आदि प्रजाजनों के लिये सुख देते हैं, इससे सबको चाहिये कि इनकी सदा पालना करें ॥ १३ ॥इस सूक्त में पवन और बिजुली आदि गुणों के वर्णन से उसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह १०८ एकसौ आठवाँ सूक्त और २७ सत्ताईसवाँ वर्ग पूरा हुआ ॥