Rigveda / 1 / 109 / 2
अश्र॑वं॒ हि भू॑रि॒दाव॑त्तरा वां॒ विजा॑मातुरु॒त वा॑ घा स्या॒लात्। अथा॒ सोम॑स्य॒ प्रय॑ती यु॒वभ्या॒मिन्द्रा॑ग्नी॒ स्तोमं॑ जनयामि॒ नव्य॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 109 | Mantra No : 2
In English:
Seer : kutsa aa~NgirasaH | Devta : indraagnii | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : ashrava.m hi bhuuridaavattaraa vaa.m vijaamaaturuta vaa ghaa syaalaat. athaa somasya prayatii yuvabhyaamindraagnii stoma.m janayaami navyam .
Component Words : ashravam. hi. bhuuridaavat.ataraa. vaam. vi.ajaamaatuH. uta. vaa. gha. syaalaat. atha. somasya. pra.ayatii. yuva.abhyaam. indraagnii iti. stomam. janayaami. navyam . 1.109.2
In Hindi:
ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : अश्र॑वम्। हि। भू॒रि॒दाव॑त्ऽतरा। वा॒म्। विऽजा॑मातुः। उ॒त। वा॒। घ॒। स्या॒लात्। अथ॑। सोम॑स्य। प्रऽय॑ती। यु॒वऽभ्या॑म्। इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑। स्तोम॑म्। ज॒न॒या॒मि॒। नव्य॑म् ॥ १.१०९.२
पदार्थ : जो (वाम्) ये (भूरिदावत्तरा) अतीव बहुत से धन की प्राप्ति करानेहारे (इन्द्राग्नी) बिजुली और भौतिक अग्नि हैं वा जो उक्त इन्द्राग्नी (विजामातुः) विरोधी जमाई (स्यालात्) साले से (उत, वा) अथवा और (घ) अन्यों जनों से धनों को दिलाते हैं यह मैं (अश्रवम्) सुन चुका हूँ (अथ, हि) अभि (युवभ्याम्) इनसे (सोमस्य) ऐश्वर्य्य अर्थात् धनादि पदार्थों की प्राप्ति करनेवाले व्यवहार के (प्रयती) अच्छे प्रकार देने के लिये (नव्यम्) नवीन (स्तोमम्) गुण के प्रकाश को मैं (जनयामि) प्रकट करता हूँ ॥ २ ॥
भावार्थ : सब मनुष्यों को बिजुली आदि पदार्थों के गुणों का ज्ञान और उनके अच्छे प्रकार कार्य में युक्त करने से नवीन-नवीन कार्य्य की सिद्धि करनेवाले कलायन्त्र आदि का विधानकर अनेक कामों को बनाकर धर्म, अर्थ और अपनी कामना की सिद्धि करनी चाहिये ॥ २ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते ।
पदपाठ : अश्र॑वम्। हि। भू॒रि॒दाव॑त्ऽतरा। वा॒म्। विऽजा॑मातुः। उ॒त। वा॒। घ॒। स्या॒लात्। अथ॑। सोम॑स्य। प्रऽय॑ती। यु॒वऽभ्या॑म्। इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑। स्तोम॑म्। ज॒न॒या॒मि॒। नव्य॑म् ॥ १.१०९.२
पदार्थ : (अश्रवम्) शृणोमि (हि) किल (भूरिदावत्तरा) अतिशयेन बहुधनदानप्राप्तिनिमित्तौ (वाम्) एतौ (विजामातुः) विगतो विरुद्धश्च जामाता च तस्मात् (उत) अपि (वा) (घ) एव। अत्र ऋचि तु० इति दीर्घः। (स्यालात्) स्वस्त्रीभ्रातुः (अथ) निपातस्य चेति दीर्घः। (सोमस्य) ऐश्वर्य्यप्रापकस्य व्यवहारस्य (प्रयती) प्रयत्यै प्रदानाय। अत्र प्रपूर्वाद्यमधातोः क्तिन् तस्माच्चतुर्थ्येकवचने सुपां सुलुगितीकारादेशः। (युवभ्याम्) एताभ्याम् (इन्द्राग्नी) पूर्वोक्तौ (स्तोमम्) गुणप्रकाशम् (जनयामि) प्रकटयामि (नव्यम्) नवीनम् ॥ २ ॥
अन्वय : यौ वामेतौ भूरिदावत्तरेन्द्राग्नी वर्त्तेते यौ विजामातुः स्यालादुतापि वा घान्येभ्यश्चैव धनानि दापयत इत्यहमश्रवं अथ हि युवभ्यामेताभ्यां सोमस्य प्रयती ऐश्वर्य्यप्रदानाय नव्यं स्तोममहं जनयामि ॥ २ ॥
भावार्थ : सर्वेषां मनुष्याणां विद्युदादिपदार्थानां गुणज्ञानसंप्रयोगाभ्यां नूतनं कार्य्यसिद्धिकरं कलायन्त्रादिकं विधायानेकानि कार्य्याणि निर्वृत्य धर्मार्थकामसिद्धिः संपादनीयेति ॥ २ ॥