Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 112 / 2

यु॒वोर्दा॒नाय॑ सु॒भरा॑ अस॒श्चतो॒ रथ॒मा त॑स्थुर्वच॒सं न मन्त॑वे। याभि॒र्धियोऽव॑थ॒: कर्म॑न्नि॒ष्टये॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 112 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : आदिमे मन्त्रे प्रथमपादस्य द्यावापृथिव्यौ, द्वितीयस्य अग्निः, शिष्टस्य सूक्तस्याश्विनौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब पढ़ाने और उपदेश करनेवालों के विषय में अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यु॒वोः। दा॒नाय॑। सु॒ऽभराः॑। अ॒स॒श्चतः॑। रथ॑म्। आ। त॒स्थुः॒। व॒च॒सम्। न। मन्त॑वे। याभिः॑। धियः॑। अव॑थः। कर्म॑न्। इ॒ष्टये॑। ताभिः॑। ऊँ॒ इति॑। सु। ऊ॒तिऽभिः॑। अ॒श्वि॒ना॒। आ। ग॒त॒म् ॥ १.११२.२

पदार्थ : हे (अश्विना) पढ़ाने और उपदेश करानेहारे विद्वानो ! (सुभराः) जो अच्छे प्रकार धारण वा पोषण करते कि जो अति आनन्द के सिद्ध करानेहारे हैं, वा (असश्चतः) जो किसी बुरे कर्म और कुसङ्ग में नहीं मिलते वे सज्जन (मन्तवे) विशेष ज्ञानने के लिये जैसे (वचसं, न) सबने प्रशंसा के साथ विख्यात किये हुए अत्यन्त बुद्धिमान् विद्वान् जन को प्राप्त होवें वैसे (युवोः) आप लोगों के (रथम्) जिस विमान आदि यान को (आ, तस्थुः) अच्छे प्रकार प्राप्त होकर स्थिर होते हैं उसके साथ (उ) और (याभिः) जिनसे (धियः) उत्तम बुद्धियों को (कर्मन्) काम के बीच (इष्टये) हुए सुख के लिये (अवथः) राखते हैं (ताभिः) उन (ऊतिभिः) रक्षाओं के साथ तुम (दानाय) सुख देने के लिये हम लोगों के प्रति (सु, आ, गतम्) अच्छे प्रकार आओ ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो तुमको उत्तम बुद्धि की प्राप्ति करावें उनकी सब प्रकार से रक्षा करो, जैसे आप लोग उनका सेवन करें वैसे ही वे लोग भी तुमको शुभ विद्या का बोध कराया करें ॥ २ ॥