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Rigveda / 1 / 112 / 18

याभि॑रङ्गिरो॒ मन॑सा निर॒ण्यथोऽग्रं॒ गच्छ॑थो विव॒रे गोअ॑र्णसः। याभि॒र्मनुं॒ शूर॑मि॒षा स॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 112 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : आदिमे मन्त्रे प्रथमपादस्य द्यावापृथिव्यौ, द्वितीयस्य अग्निः, शिष्टस्य सूक्तस्याश्विनौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब सब राजजनों को किसके तुल्य सुख भोगने चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : याभिः॑। अ॒ङ्गि॒रः॒। मन॑सा। नि॒ऽर॒ण्यथः॑। अग्र॑म्। गच्छ॑थः। वि॒ऽव॒रे। गोऽअ॑र्णसः। याभिः॑। मनु॒म्। शूरम्। इ॒षा। स॒म्ऽआव॑तम्। ताभिः॑। ऊँ॒ इति॑। सु। ऊ॒तिऽभिः॑। अ॒श्वि॒ना॒। आ। ग॒त॒म् ॥ १.११२.१८

पदार्थ : हे (अङ्गिरः) जाननेहारे विद्वान् ! तू (मनसा) विज्ञान से विद्या और धर्म्म का सबको बोध करा। हे (अश्विना) सेना के पालन और युद्ध करानेहारे जन ! तुम (याभिः) जिन (ऊतिभिः) रक्षाओं के साथ (गोअर्णसः) पृथिवी जल के (विवरे) अवकाश में (निरण्यथः) संग्राम करते और (अग्रम्) उत्तम विजय को (गच्छथः) प्राप्त होते वा (याभिः) जिन रक्षाओं से (शूरम्) शूरवीर (मनुम्) मननशील मनुष्य को (समावतम्) सम्यक् रक्षा करो (ताभिरु) उन्हीं रक्षा और (इषा) इच्छा से हमारी रक्षा के लिये (सु, आ, गतम्) उचित समय पर आया कीजिये ॥ १८ ॥

भावार्थ : जैसे विद्वान् विज्ञान से सब सुखों को सिद्ध करता है वैसे सब राजपुरुषों को अनेक साधनों से पृथिवी, नदी और समुद्र से आकाश के मध्य में शत्रुओं को जीत के सुखों को अच्छे प्रकार प्राप्त होना चाहिये ॥ १८ ॥