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Rigveda / 1 / 113 / 12

या॒व॒यद्द्वे॑षा ऋत॒पा ऋ॑ते॒जाः सु॑म्ना॒वरी॑ सू॒नृता॑ ई॒रय॑न्ती। सु॒म॒ङ्ग॒लीर्बिभ्र॑ती दे॒ववी॑तिमि॒हाद्योष॒: श्रेष्ठ॑तमा॒ व्यु॑च्छ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 113 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उषा के प्रसङ्ग से स्त्रीविषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : या॒व॒यत्ऽद्वे॑षाः। ऋ॒त॒ऽपाः। ऋ॒ते॒ऽजाः। सु॒म्न॒ऽवरी॑। सू॒नृताः॑। ई॒रय॑न्ती। सु॒ऽम॒ङ्ग॒लीः। बिभ्र॑ती। दे॒वऽवी॑तिम्। इ॒ह। अ॒द्य। उ॒षः॒। श्रेष्ठ॑ऽतमा। वि। उ॒च्छ॒ ॥ १.११३.१२

पदार्थ : हे (उषः) उषा के वर्त्तमान विदुषी स्त्रि ! (यावयद्द्वेषाः) जिसने द्वेषयुक्त कर्म दूर किये (ऋतपाः) सत्य की रक्षक (ऋतेजाः) सत्य व्यवहार में प्रसिद्ध (सुम्नावरी) जिसमें प्रशंसित सुख विद्यमान वा (सुमङ्गलीः) जिसमें सुन्दर मङ्गल होते उन (सूनृताः) वेदादि सत्यशास्त्रों की सिद्धान्तवाणियों को (ईरयन्ती) शीघ्र प्रेरणा करती हुई (श्रेष्ठतमा) अतिशय उत्तम गुण, कर्म और स्वभाव से युक्त (देववीतिम्) विद्वानों की विशेष नीति को (बिभ्रती) धारण करती हुई तूं (इह) यहाँ (अद्य) आज (व्युच्छ) दुःख को दूर कर ॥ १२ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभात वेला अन्धकार का निवारण, प्रकाश का प्रादुर्भाव करा, धार्मिकों को सुखी और चोरादि को पीड़ित करके सब प्राणियों को आनन्दित करती है, वैसे ही विद्या, धर्म, प्रकाशवती शमादि गुणों से युक्त, विदुषी, उत्तम स्त्री अपने पतियों से सन्तानोत्पत्ति करके अच्छी शिक्षा से अविद्यान्धकार को छुड़ा विद्यारूप सूर्य को प्राप्त करा कुल को सुभूषित करें ॥ १२ ॥