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Rigveda / 1 / 114 / 3

अ॒श्याम॑ ते सुम॒तिं दे॑वय॒ज्यया॑ क्ष॒यद्वी॑रस्य॒ तव॑ रुद्र मीढ्वः। सु॒म्ना॒यन्निद्विशो॑ अ॒स्माक॒मा च॒रारि॑ष्टवीरा जुहवाम ते ह॒विः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 114 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : रुद्रः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अ॒श्याम॑। ते॒। सु॒ऽम॒तिम्। दे॒व॒ऽय॒ज्यया॑। क्ष॒यत्ऽवी॑रस्य। तव॑। रु॒द्र॒। मी॒ढ्वः॒। सु॒म्न॒ऽयन्। इत्। विशः॑। अ॒स्माक॑म्। आ। च॒र॒। अरि॑ष्टऽवीराः। जु॒ह॒वा॒म॒। ते॒। ह॒विः ॥ १.११४.३

पदार्थ : हे (मीढ्वः) प्रजा को सुख से सींचने और (रुद्र) सत्योपदेश करनेवाले सभाध्यक्ष राजन् ! हम लोग (देवयज्यया) विद्वानों की सङ्गति और सत्कार से (क्षयद्वीरस्य) वीरों का निवास करानेहारे (तव) तेरी (सुमतिम्) श्रेष्ठ प्रज्ञा को (अश्याम) प्राप्त होवें, जो (सुम्नयन्) सुख कराता हुआ तू (अस्माकम्) हमारी (अरिष्टवीराः) हिंसारहित वीरोंवाली (विशः) प्रजाओं को (आ, चर) सब ओर से प्राप्त हो, उस (ते) तेरी प्रजाओं को हम लोग (इत्) भी प्राप्त हों और (ते) तेरे लिये (हविः) देने योग्य पदार्थ को (जुहवाम) दिया करें ॥ ३ ॥

भावार्थ : राजा को योग्य है कि प्रजाओं को निरन्तर प्रसन्न रक्खे और प्रजाओं को उचित है कि राजा को आनन्दित करें। जो राजा प्रजा से कर लेकर पालन न करे तो वह राजा डाकुओं के समान जानना चाहिये। जो पालन की हुई प्रजा राजभक्त न हों वे भी चोर के तुल्य जाननी चाहिये, इसलिये प्रजा राजा को कर देती है कि जिससे यह हमारा पालन करे और राजा इसलिये पालन करता है कि जिससे प्रजा मुझको कर देवें ॥ ३ ॥