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Rigveda / 1 / 114 / 8

मा न॑स्तो॒के तन॑ये॒ मा न॑ आ॒यौ मा नो॒ गोषु॒ मा नो॒ अश्वे॑षु रीरिषः। वी॒रान्मा नो॑ रुद्र भामि॒तो व॑धीर्ह॒विष्म॑न्त॒: सद॒मित्त्वा॑ हवामहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 114 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : रुद्रः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर राजजन कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : मा। नः॒। तो॒के। तन॑ये। मा। नः॒। आ॒यौ। मा। नः॒। गोषु॑। मा। नः॒। अश्वे॑षु। रि॒रि॒षः॒। वी॒रान्। मा। नः॒। रु॒द्र॒। भा॒मि॒तः। व॒धीः॒। ह॒विष्म॑न्तः। सद॑म्। इत्। त्वा॒। ह॒वा॒म॒हे॒ ॥ १.११४.८

पदार्थ : हे (रुद्र) दुष्टों को रुलानेहारे सभापति ! (हविष्मन्तः) जिनके प्रशंसायुक्त संसार के उपकार करने के काम हैं, वे हम लोग जिस कारण (सदम्) स्थिर वर्त्तमान ज्ञान को प्राप्त (त्वाम्, इत्) आप ही को (हवामहे) अपना करते हैं, इससे (भामितः) क्रोध को प्राप्त हुए आप (नः) हम लोगों के (तोके) उत्पन्न हुए बालक वा (तनये) बालिकाईं से जो ऊपर है, उस बालक में (मा) (रीरिषः) घात मत करो (नः) हम लोगों के (आयौ) जीवन विषय में (मा) मत हिंसा करो (नः) हम लोगों के (गोषु) गौ आदि पशुसंघात में (मा) मत घात करो (नः) हम लोगों के (अश्वेषु) घोड़ों में (मा) घात मत करो (नः) हमारे (वीरान्) वीरों को (मा) मत (वधीः) मारो ॥ ८ ॥

भावार्थ : क्रोध को प्राप्त हुए सज्जन राजपुरुषों को किसी का अन्याय से हनन न करना चाहिये और गौ आदि पशुओं की सदा रक्षा करनी चाहिये। प्रजाजनों को भी राजा के आश्रय से ही निरन्तर आनन्द करना चाहिये और सबों को मिलकर ईश्वर की ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमेश्वर ! आपकी कृपा से हम लोग बाल्यावस्था में विवाह आदि बुरे काम करके पुत्रादिकों का विनाश कभी न करें और वे पुत्र आदि भी हम लोगों के विरुद्ध काम को न करें तथा संसार का उपकार करने हारे गौ आदि पशुओं का कभी विनाश न करें ॥ ८ ॥