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Rigveda / 1 / 116 / 10

जु॒जु॒रुषो॑ नासत्यो॒त व॒व्रिं प्रामु॑ञ्चतं द्रा॒पिमि॑व॒ च्यवा॑नात्। प्राति॑रतं जहि॒तस्यायु॑र्द॒स्रादित्पति॑मकृणुतं क॒नीना॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 116 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब सामान्य से विधि का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

पदपाठ : जु॒जु॒रुषः॑। ना॒स॒त्या॒। उ॒त। व॒व्रिम्। प्र। अ॒मु॒ञ्च॒त॒म्। द्रा॒पिम्ऽइ॑व। च्यवा॑नात्। प्र। अ॒ति॒र॒त॒म्। ज॒हि॒तस्य॑। आयुः॑। द॒स्रा॒। आत्। इत्। पति॑म्। अ॒कृ॒णु॒त॒म्। क॒नीना॑म् ॥ १.११६.१०

पदार्थ : हे (नासत्या) राजधर्म की सभा के पति ! तुम दोनों (च्यवानात्) भागे हुए से (द्रापिमिव) कवच के समान (वव्रिम्) अच्छे विभाग करानेवाले को (प्रामुञ्चतम्) भलीभाँति दुःख से पृथक् करो (उत) और (जुजुरुषः) बुड्ढे विद्यावान् शास्त्रज्ञ पढ़ानेवाले से (कनीनाम्) यौवनपन से तेजधारिणी ब्रह्मचारिणी कन्याओं को शिक्षा (अकृणुतम्) करो (आत्) इसके अनन्तर नियत समय की प्राप्ति में उनमें से एक-एक (इत्) ही का एक-एक (पतिम्) रक्षक पति करो। हे (दस्रा) वैद्यों के समान प्राण के देनेहारो ! (जहितस्य) त्यागी की (आयुः) आयुर्दा को (प्रातिरतम्) अच्छे प्रकार पार लों पहुँचाओ ॥ १० ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजपुरुष और उपदेश करनेवालों को देनेवालों का दुःख दूर करना चाहिये, विद्याओं में प्रवृत्ति करते हुए कुमार और कुमारियों की रक्षा कर विद्या और अच्छी शिक्षा उनको दिलवाना चाहिये। बालकपन में अर्थात् पच्चीस वर्ष के भीतर पुरुष और सोलह वर्ष के भीतर स्त्री के विवाह को रोक, इसके उपरान्त अड़तालीस वर्ष पर्य्यन्त पुरुष और चौबीस वर्ष पर्यन्त स्त्री का स्वयंवर विवाह कराकर सबके आत्मा और शरीर के बल को पूर्ण करना चाहिये ॥ १० ॥