Rigveda / 1 / 117 / 3
ऋषिं॑ नरा॒वंह॑स॒: पाञ्च॑जन्यमृ॒बीसा॒दत्रिं॑ मुञ्चथो ग॒णेन॑। मि॒नन्ता॒ दस्यो॒रशि॑वस्य मा॒या अ॑नुपू॒र्वं वृ॑षणा चो॒दय॑न्ता ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 117 | Mantra No : 3
In English:
Seer : kakShiivaan | Devta : ashvinau | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : RRiShi.m naraava.mhasaH paa~nchajanyamRRibiisaadatri.m mu~nchatho gaNena. minantaa dasyorashivasya maayaa anupuurva.m vRRiShaNaa chodayantaa .
Component Words : RRiShim. narau. a.mhasaH. paa~ncha.ajanyam. RRIbiisaat. atrim. mu~nchathaH. gaNena. minantaa. dasyoH. ashivasya. maayaaH. anu.apuurvam. vRRiShaNaa. chodayantaa . 1.117.3
In Hindi:
ऋषि : कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अब पढ़ने और पढ़ाने रूप राजधर्म का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।
पदपाठ : ऋषि॑म्। न॒रौ॒। अंह॑सः। पाञ्च॑ऽजन्यम्। ऋ॒बीसा॑त्। अत्रि॑म्। मु॒ञ्च॒थः॒। ग॒णेन॑। मि॒नन्ता॑। दस्योः॑। अशि॑वस्य। मा॒याः। अ॒नु॒ऽपू॒र्वम्। वृ॒ष॒णा॒। चो॒दय॑न्ता ॥ १.११७.३
पदार्थ : हे (नरौ) विद्या प्राप्ति कराने (वृषणा) सुख के वर्षाने (चोदयन्ता) और विद्या आदि शुभ गुणों में प्रेरणा करनेवाले तथा (अशिवस्य) सबको दुःख देनेहारे (दस्योः) उचक्के की (मायाः) कपट क्रियाओं को (मिनन्ता) काटनेवाले सभासेनाधीशो ! तुम दोनों (अनुपूर्वम्) अनुकूल वेद में कहे और उत्तम विद्वानों में माने हुए सिद्धान्त जिसके, उस (पाञ्चजन्यम्) प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान में सिद्ध हुई योगसिद्धि को और जिसके सम्बन्ध में (अत्रिम्) आत्मा, मन और शरीर के दुःख नष्ट हो जाते हैं, उस (गणेन) पढ़ने-पढ़ानेवालों के साथ वर्त्तमान (ऋषिम्) वेदपारगन्ता अध्यापक को, (ऋबीसात्) नष्ट हुआ है विद्या का प्रकाश जिससे उस अविद्यारूप अन्धकार (अंहसः) और विद्या पढ़ाने को रोक देने रूप अत्यन्त पाप से (मुञ्चथः) अलग रखते हो ॥ ३ ॥
भावार्थ : राजपुरुषों का यह अत्यन्त उत्तम काम है जो विद्याप्रचार करनेहारों को दुःख से बचाना, उनको सुख में राखना और डाकू उचक्के आदि दुष्ट जनों को दूर करना और वे राजपुरुष आप विद्या और धर्मयुक्त हो विद्वानों को विद्या और धर्म्म के प्रचार में लगाकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि करें ॥ ३ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अथाध्ययनाऽध्यापनाख्यमाह।
पदपाठ : ऋषि॑म्। न॒रौ॒। अंह॑सः। पाञ्च॑ऽजन्यम्। ऋ॒बीसा॑त्। अत्रि॑म्। मु॒ञ्च॒थः॒। ग॒णेन॑। मि॒नन्ता॑। दस्योः॑। अशि॑वस्य। मा॒याः। अ॒नु॒ऽपू॒र्वम्। वृ॒ष॒णा॒। चो॒दय॑न्ता ॥ १.११७.३
पदार्थ : (ऋषिम्) वेदपारगाध्यापकम् (नरौ) विद्यानेतारौ (अंहसः) विद्याध्ययननिरोधकाद्विघ्नाख्यात् पापात् (पाञ्चजन्यम्) पञ्चसु जनेषु प्राणादिषु भवां प्राप्तयोगसिद्धिम् (ऋबीसात्) नष्टविद्याप्रकाशविद्यारूपात्। ऋबीसमपगतभासमपहृतभासमन्तर्हितभासं गतभासं वा। निरु० ६। ३५। (अत्रिम्) अविद्यमानान्यात्ममनः शरीरदुःखानि येन तम् (मुञ्चथः) (गणेन) अन्याध्यापकविद्यार्थिसमूहेन (मिनन्ता) हिंसन्तौ (दस्योः) उत्कोचकस्य (अशिवस्य) सर्वस्मै दुःखप्रदस्य (मायाः) कपटादियुक्ताः क्रियाः (अनुपूर्वम्) अनुकूलाः पूर्वे वेदोक्ता आप्तसिद्धान्ता यस्य तम् (वृषणा) सुखस्य वर्षकौ (चोदयन्ता) विद्यादिशुभगुणेषु प्रेरयन्तौ ॥ ३ ॥
अन्वय : हे नरौ वृषणा चोदयन्ताऽशिवस्य दस्योर्माया मिनन्ताऽनुपूर्वं पाञ्चजन्यमत्रिं गणेनर्षिमृबीसादंहसो मुञ्चथः ॥ ३ ॥
भावार्थ : राजपुरुषाणामिदमुत्तमतमं कर्मास्ति यद्विद्याप्रचारकर्त्तॄणां दुःखात् संरक्षणं सुखे संस्थापनं दस्य्वादीनां निवर्त्तनं स्वयं विद्याधर्मयुक्ता भूत्वा विदुषो विद्याधर्मप्रचारे संप्रेर्य्य धर्मार्थकाममोक्षान् संसाधयेयुः ॥ ३ ॥