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Rigveda / 1 / 117 / 10

ए॒तानि॑ वां श्रव॒स्या॑ सुदानू॒ ब्रह्मा॑ङ्गू॒षं सद॑नं॒ रोद॑स्योः। यद्वां॑ प॒ज्रासो॑ अश्विना॒ हव॑न्ते या॒तमि॒षा च॑ वि॒दुषे॑ च॒ वाज॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 117 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब बिजुली आदि पदार्थरूप संसार का बनानेवाला परमेश्वर ही उपासनीय है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ए॒तानि॑। वा॒म्। श्र॒व॒स्या॑। सु॒दा॒नू॒ इति॑ सुऽदानू। ब्रह्म॑। आ॒ङ्गू॒षम्। सद॑नम्। रोद॑स्योः। यत्। वा॒म्। प॒ज्रासः॑। अ॒श्वि॒ना॒। हव॑न्ते। या॒तम्। इ॒षा। च॒। वि॒दुषे॑। च॒। वाज॑म् ॥ १.११७.१०

पदार्थ : हे (सुदानू) अच्छे दान देनेवाले (अश्विनौ) सभा सेनाधीशो ! (वाम्) तुम दोनों के (एतानि) ये (श्रवस्या) अन्न आदि पदार्थों में उत्तम प्रशंसा योग्य कर्म हैं इस कारण (वाम्) तुम दोनों (पज्रासः) विशेष ज्ञान देनेवाले मित्र जन (यत्) जिस (रोदस्योः) पृथिवी और सूर्य के (सदनम्) आधाररूप (आङ्गूषम्) विद्याओं के ज्ञान देनेवाले (ब्रह्म) सर्वज्ञ परमेश्वर को (हवन्ते) ध्यान मार्ग से ग्रहण करते (च) और जिसको तुम लोग (यातम्) प्राप्त होते हो उसके (वाजम्) विज्ञान को (इष) इच्छा और (च) अच्छे यत्न तथा योगाभ्यास से (विदुषे) विद्वान् के लिये भलीभाँति पहुँचाओ ॥ १० ॥

भावार्थ : सब मनुष्यों को चाहिये कि सबका आधार, सबको उपासना के योग्य, सबका रचनेहारा ब्रह्म जिन उपायों से जाना जाता है, उनसे जान औरों के लिये भी ऐसे ही जनाकर पूर्ण आनन्द को प्राप्त होवें ॥ १० ॥