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Rigveda / 1 / 117 / 13

यु॒वं च्यवा॑नमश्विना॒ जर॑न्तं॒ पुन॒र्युवा॑नं चक्रथु॒: शची॑भिः। यु॒वो रथं॑ दुहि॒ता सूर्य॑स्य स॒ह श्रि॒या ना॑सत्यावृणीत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 117 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर जवान अवस्था ही में विवाह करना अवश्य है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यु॒वम्। च्यवा॑नम्। अ॒श्वि॒ना॒। जर॑न्तम्। पुनः॑। युवा॑नम्। च॒क्र॒थुः॒। शची॑भिः। यु॒वोः। रथ॑म्। दु॒हि॒ता। सूर्य॑स्य। स॒ह। श्रि॒या। ना॒स॒त्या॒। अ॒वृ॒णी॒त॒ ॥ १.११७.१३

पदार्थ : हे (नासत्या) सत्य वर्त्ताव वर्त्तनेवाले (अश्विना) शरीर और आत्मा के बल से युक्त सभासेनाधीशो ! (युवम्) तुम दोनों (शचीभिः) अच्छी बुद्धियों वा कर्मों के साथ वर्त्तमान अपने सन्तानों को भली-भाँति सेवा कर ज्वान (चक्रथुः) करो (पुनः) फिर (युवोः) तुम दोनों की युवती अर्थात् यौवन अवस्था को प्राप्त (सूर्यस्य) सूर्य की किई हुई प्रातःकाल की वेला के समान (दुहिता) कन्या (श्रिया) धन, शोभा, विद्या वा सेवा के (सह) साथ वर्त्तमान (च्यवानम्) गमन और (जरन्तम्) प्रशंसा करनेवाले (युवानम्) ज्वानी से परिपूर्ण (रथम्) रमण करने योग्य मनोहर पति को (अवृणीत) वरे और पुत्र भी ऐसा ज्वान होता हुआ युवति स्त्री को वरे ॥ १३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। माता-पिता आदि को अतीव योग्य है कि जब अपने सन्तान पूर्ण अच्छी सिखावट, विद्या, शरीर और आत्मा के बल, रूप, लावण्य, स्वभाव, आरोग्यपन, धर्म और ईश्वर को जानने आदि उत्तम गुणों के साथ वर्त्ताव रखने को समर्थ हों तब अपनी इच्छा और परीक्षा के साथ आप ही स्वयंवर विधि से दोनों सुन्दर समान गुण, कर्म, स्वभावयुक्त पूरे ज्वान, बली, लड़की-लड़के विवाह कर ऋतु समय में साथ का संयोग करनेवाले होकर, धर्म के साथ अपना वर्त्ताव वर्त्तकर प्रजा अर्थात् सन्तानों को अच्छे उत्पन्न करें, यह उपदेश देने चाहियें। विना इसके कभी कुल की उन्नति होने के योग्य नहीं है, इससे सज्जन पुरुषों को ऐसा ही सदा करना चाहिये ॥ १३ ॥